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लोकचेतना को समर्पित
लघुकथा : कभी न भर सकने वाला रिक्त स्थान- सुजाता प्रसाद

एक समान परिवेश में एक ही तरह की परवरिश मिली फिर प्रथम पुत्री प्रेम, द्वितीय सेवा, तृतीय उपेक्षा और चतुर्थ घृणा का प्रभावी परिणाम कैसे हो जाती है? एक दूसरे से सर्वथा अलग, यह एक सोचनीय पहलू है। हालांकि अन्य प्राणियों की तरह सब में सभी गुण-दुर्गुण एकसार रुप से मौजूद हैं, प्रभावी होने की प्रमुखता लिए हुए। मां की बेटियां हुईं चार, मां से मिला बराबर प्यार। फिर कैसे पहली बेटी प्रेम का, दूसरी बेटी सेवा का, तीसरी बेटी उपेक्षा और आखिरी बेटी घृणा का परिणाम बन गई। ऐसा होने में ना मां का कोई योगदान था, ना बेटियों की गलती थी अपनी कोई। सब समय का चक्र था। समय के हाथों बने सब कठपुतली थे।

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एक बेटे को छोड़कर बेटियां तो हर बार बचा ली गईं, बिना किसी नुकसान के। अच्छी पालन पोषण के हाथ का साथ मिला और उच्च शिक्षा की प्राप्ति भी हो गई। संस्कृति और संस्कार के लिबास में पली बढ़ी बेटियां बिना किसी भेदभाव के। बस समय अपने गर्भ से समाज के नियमों की परिधि खींच कर बेटे की चाह में बेटियों के चार प्रतीकों को एक एक कर सौंपता गया। अब ये प्रतीक एक दूसरे से बंधे हैं। समय का कुचक्र अट्टाहास करते हुए अपनी चाल में बढ़ता चला जा रहा है। बेटियों में जिसकी जैसी विशालता है उससे वैसा सहयोग मिल रहा है समय को। पर अफसोस बेटे की कमी आज भी खल रही है और समय के पृष्ठ पर अपनी छटपटाहट में सांसें ले रहा है “कभी न भर सकने वाला एक रिक्त स्थान”।

प्रसिद्ध चित्रकार निर्मला सिंह की पेंटिंग, लोकमंच पत्रिका
प्रसिद्ध चित्रकार निर्मला सिंह की पेंटिंग, लोकमंच पत्रिका

माता पिता के लिए तो पुत्र और पुत्री दोनों ही अनमोल हैं। कहते हैं समय परिवर्तनशील है, लेकिन समाज की इस सोच में कब परिवर्तन आएगा आज भी सवालों के घेरे में ही है। सामाजिक सोच में व्यापक स्तर पर संशोधन ही एक नई राह दिखा सकता है। शायद जब तक कन्याओं को दान देने की प्रथा चलती रहेगी तब तक माता और पिता पुत्र मोह के संस्कार से कभी मुक्त नहीं हो पाएंगे और समय के गह्वर में न चाहते हुए भी तिरस्कृत होती रहेंगी बेटियां। पुत्र ही मोक्षदायक है, जब तक मस्तिष्क से ये बीज नहीं निकाले जाएंगे तब तक पुत्र मोह की चाहत मजबूती से, मजबूरी में संवर्धित होती रहेगी और उजागर होती रहेंगी बेटियां परिष्कृत कथाओं की आवाज बनकर। साथ में चलती रहेगी महिला दिवस पर की जाने वाली बड़ी बड़ी बातें।

लेखिका सुजाता प्रसाद प्रसिद्ध कवयित्री के साथ-साथ सनराइज एकेडमी, नई दिल्ली में शिक्षिका हैं । ईमेल : sansriti.sujata@gmail.com

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92 thoughts on “लघुकथा : कभी न भर सकने वाला रिक्त स्थान- सुजाता प्रसाद

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