लोकमंच पत्रिका

लोकचेतना को समर्पित
सुजाता प्रसाद की दो कविताएं

कविता : पतझड़ एक अवसान

पतझड़ था आया 

पत्तियों की बरसात थी,

एक अवसान था

फूलों की नौशीन बौछार थी।

द्रुमदल की सेज पर 

चर्रमर्र सबकी कदमताल थी,

पंखुड़ियों के गलीचे सी 

धरती पर बिछी बहार थी।

सुरभित सुमन से हरित पर्ण से 

सज गई अवनि थी,

त्याग सर्वस्व अपना 

नवसृजन में जुटी सृष्टि थी।

तरू के रोम रोम से 

पुष्प हैं गिरते, द्रुम हैं झरते,

प्रकृति के पोर पोर से 

हरियाली हैं हरते।

पत्ररहित शाख

सूना सा शज़र है,

पतझड़ की है धाक

बस मौसम का सफ़र है।

विरानी नहीं यह तो

अंत का आरंभ है

कोई मिथक कहां

बाद पतझड़ के बसंत है।

पत्र विहिन वनस्पतियां 

विषाद नहीं हैं पतझड़ का,

ये आह्लाद है आगत का 

बसंत के स्वागत का।

स्वाति स्वेता की पेंटिंग , लोकमंच पत्रिका
स्वाति स्वेता की पेंटिंग , लोकमंच पत्रिका

कविता : बसंत एक रंग

बसंत एक रंग है, 

प्रकृति का प्रसंग है

भाव मन के मौसम का 

उत्साह है उमंग है।

मुस्कुरा उठी धरा 

विहंस रहा आसमां

हलचल है तरूणाई है 

बसंत के आने से।

आह्लादित अवलोड़न है 

अवनि के आंगन में

अंतस ले रहा अंगड़ाई है 

बसंत के आने से।

धरती के आंचल में 

टांके फूल हजारों हैं

रंग बिरंगा हुआ है प्रांगण 

बसंत के आने से।

अलमस्ती का आलम है, 

हवा का हिलोड़न है

हर्षित सी है हरियाली 

बसंत के आने से।

बिखर गया अनुपम सौंदर्य 

छा गई बागों में बहार है

पृथ्वी ने पहना नव परिधान 

बसंत के आने से।

कवयित्री सुजाता प्रसाद, शिक्षिका सनराइज एकेडमी, नई दिल्ली में शिक्षिका हैं साथ ही वे मोटिवेशनल ओरेटर भी हैं। ईमेल : sansriti.sujata@gmail.com

34 thoughts on “सुजाता प्रसाद की दो कविताएं

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