लोकमंच पत्रिका

लोकचेतना को समर्पित
विद्या की देवी मां सरस्वती – सुजाता प्रसाद

माघ माह के शुक्ल पक्ष के पांचवें दिन बसंत पंचमी मनाई जाती है। ऐसी मान्यता है कि बसंत पचंमी के दिन ही मां सरस्वती प्रकट हुई थीं। मां सरस्वती ज्ञान और संगीत की देवी हैं। इस दिन मां सरस्वती की पूजा करने से विद्या और बुद्धि का वरदान मिलता है। इसलिए यह विशेष दिन विद्यार्थियो और संगीत के क्षेत्र से संबंधित लोगों के लिए के लिए बहुत महत्व रखता है। विद्या की अधिष्ठात्री देवी मां सरस्वती के पूजन दिवस को “श्री पंचमी” के नाम से भी जाना जाता है। प्राचीन समय से भारत की संस्कृति में इस दिन विद्या आरंभ करने की परंपरा रही है, जिसे आज भी अपनाए रखने की कोशिश की जाती है। 

विद्या नाम नरस्य कीर्तिर्तुला भाग्यक्षये चाश्रयो।

धेनुः कामदुधा रतिश्च विरहे नेत्रं तृतीयं च सा॥

सत्कारायतनं कुलस्य महिमा रत्नैर्विना भूषणम्।

तस्मादन्यमुपेक्ष्य सर्वविषयं विद्याधिकारं कुरु॥

अर्थात, विद्या मनुष्य की अनुपम कीर्ति है, भाग्य का नाश होने पर वह आश्रय देती है, विद्या कामधेनु है, विरह में रति समान है, विद्या ही तीसरा नेत्र है, सत्कार का मंदिर है, कुल की महिमा है, बिना रत्न का आभूषण है; इस लिए अन्य सब विषयों को छोडकर विद्या के अधिकारी बनें।

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पौराणिक कथाओं में किंवदंती है कि बसंत पंचमी के दिन भगवान ब्रह्मा ने जब सृष्टि की रचना की तो सृष्टि रचयिता को अपने सृजन में कुछ कमी नजर आई। तब उन्होंने अपने कमंडल से अभिमंत्रित जल का छिड़काव किया जिससे एक दिव्य देवी का प्राकट्य हुआ। जिनके एक हाथ में वीणा और दूसरे हाथ में पुस्तक थी, तीसरे में स्फटिक माला था और चौथा हाथ वर मुद्रा में था। जब देवी ने वीणा को बजाया तो संसार के हर वस्तु में स्वर का संचार हो गया। इस कारण उसके बाद देवी का नाम “सरस्वती” पड़ा और मां सरस्वती की पूजा अर्चना होने लगी। 

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मां सरस्वती की पूजा के दिन पूजन स्थान की स्वच्छता का विशेष ध्यान रखा जाता है। फिर सुबह स्नानादि से निवृत्त होकर  पीले या नवीन वस्त्र धारण करके मां सरस्वती की प्रतिमा को पीत वस्त्र अर्पित करने के बाद रोली, चंदन, हल्दी, केसर, चंदन, अक्षत, फूलों और मिष्ठान से पूजा की जाती है। मां शारदे की विशेष कृपा पाने के लिए इस दिन शिक्षा से संबंधित सभी पुस्तकों और संगीत से जुड़े वाद्य यंत्रों की पूजा करने का भी विधान है। पूजा के बाद भक्ति भाव से मां सरस्वती की वंदना की जाती है। विद्या की अधिष्ठात्री देवी मां सरस्वती के पूजन दिवस को “श्री पंचमी” के नाम से भी जाना जाता है। पांचांग के अनुसार इस दिन को निर्विघ्न माना गया है, यही कारण है कि इस दिन किसी भी नए कार्य को शुरू करने के लिए बहुत ही शुभ दिन माना जाता है।

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मां सरस्वती को कई नामों से जाना जाता है ,मां शारदा, मां भारती, मां वीणावादिनी, मां बुद्धिदायिनी, मां हंसवाहिनी, मां वा‍गीश्वरी, मां चंद्रकांता, मां भुवनेश्वरी, मां वागीश्वरी, मां ब्रह्मचारिणी इत्यादि, जिनके स्मरण मात्र से मनुष्य के जीवन में परिवर्तन होते हैं और अच्छे फल मिलते हैं। श्वेताम्बरा, शुभ्रवर्णा, चेहरे पर मधुर स्मित मुस्कान लिए, सभी अलंकारों से अलंकृत हंसारूढ़ा मां के एक हाथ में ज्ञान के पुस्तक से संपूर्ण लोक ज्ञानोदय से आनंदित हो रहा है तो दूसरे हाथ में वीणा के संगीत से प्रकृति का कण कण स्पंदित हो रहा है। वाणी के रूप में मां सरस्वती पूरी प्रकृति के स्वर, ताल और संगीत में विराजमान हैं। विद्या की अधिष्ठात्री देवी सरस्वती ही वाणी और ज्ञान हैं।

लेखिका सुजाता प्रसाद, शिक्षिका सनराइज एकेडमी, नई दिल्ली में शिक्षिका हैं साथ ही वे मोटिवेशनल ओरेटर भी हैं। ईमेल : sansriti.sujata@gmail.com

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