लोकमंच पत्रिका

लोकचेतना को समर्पित
बाल अधिकार व आम-अवाम के प्रति प्रतिबद्ध कवि श्री कैलाश सत्‍यार्थी

श्री कैलाश सत्यार्थी को नोबेल शांति पुरस्कार प्राप्ति की 6ठी वर्षगांठ पर विशेष

नोबेल शांति पुरस्‍कार से सम्‍मानित श्री कैलाश सत्‍यार्थी को दुनिया एक बाल अधिकार कार्यकर्ता के रूप में जानती है। बाल अधिकार का जब भी जिक्र होता है श्री कैलाश सत्‍यार्थी का नाम सहसा सामने आ जाता है। बाल अधिकार और श्री सत्‍यार्थी एक-दूसरे के पर्याय हो गए हैं। लेकिन श्री सत्‍यार्थी एक बेहद संवेदनशील कवि भी हैं इसको बहुत कम लोग जानते हैं। उनकी संवेदना, करुणा एक ओर जहां बच्‍चों से जुड़ती हैं, वहीं दूसरी ओर उनका कवि वहांभी हाहाकार कर उठता है जहां जुल्‍म-ओ-सितम के कोह-ए-गिरा हैं। नागार्जुन के शब्‍दों में कहूं तो श्री सत्‍यार्थी एक ओर जहां यदि बच्‍चों के प्रति प्रतिबद्ध,आबद्ध और सम्‍बद्धकवि हैं, तो वहीं दूसरी ओर उनकी सन्‍न्‍द्धता आम-अवाम के प्रति भी है।श्री सत्‍यार्थी के रूप में हिंदी में शायद पहली बार ऐसा कवि भी देखने में आ रहा है, जिनकी कविताएं उनके सरोकार या पेशे से नाभिनाल बद्ध हैं।

श्री कैलाश सत्यार्थी, लोकमंच पत्रिका
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बाल अधिकारों के इकलौते कवि हैं श्री सत्‍यार्थी

भारतीय भाषाओं में प्रचुर मात्रा में बाल साहित्‍य की रचनाएं देखने को मिलती हैं। बांग्‍ला, मराठी, कन्‍नड़, गुजराती आदि में तो किसी को तब तक लेखक के रूप में मान्‍यता नहीं मिलती है जब तक कि वह बच्‍चों पर नहीं लिख लेता है। इस तरह से लगभग सभी लेखकों ने बच्‍चों पर जरूर कुछ न कुछ लिखा है। लेकिन बच्‍चों पर लिखने का मतलब यह नहीं है कि उन्‍होंने वैसे बच्‍चों पर भी लिखा है जो सामाजिक-सांस्‍कृतिक कारणों से शोषित, पीडि़त और हाशिए पर हैं और जिनका बचपन खो गया है। रोटी, खेल, पढ़ाई, प्‍यार जिनके लिए सपने सरीखे हैं। उल्‍लेखनीय है कि श्री सत्‍यार्थी की कविताओं का विषय ऐसे ही बच्‍चे प्रमुखता से बनते हैं, जिसे हम बाल मजदूर कहते हैं। इस दृष्टिकोण से देखें, तो श्री सत्‍यार्थी भारतीय भाषाओं में इकलौते ऐसे कवि ठहरते हैं, जिन्‍होंने बाल मजदूरों को संबोधित 3 दर्जन से अधिक कविताएं लिखी हैं।

बाल मजदूरों पर केंद्रित कविताएं लिखकर वे भारतीय साहित्‍य की उस कमी को भी पूरा कर रहे हैं जिसकी ओर कवियों, साहित्‍यकारों का ध्‍यान सायास या अनायास नहीं जाता है। यहां यह भी सवाल पैदा होता है कि सबसे अधिक संवेदनशील और नैतिक होने का दावा करने वाले हम कवि-लेखकों की करुणा उस वक्‍त कहां कुंद हो जाती है, जब कालीन बुनाई का काम करने वाले बाल मजदूरों से ऊन के धागों को हंसिए से काटने में यदि चूक हो जाती है और उनकी अंगुलियां कट जाती हैं, तो उसका मालिक मरहम-पट्टी कराने की बजाय, माचिस की तीलियों पर लगा रोगन मसल कर उसके कटे हुए घावों में भर देता है?  बाद में दियासलाई की दूसरी तीली सुलगा कर रोगन भरे उसके घावों पर भी रख देता है? यह महज संयोग नहीं है कि श्री सत्‍यार्थी बाल अधिकार कार्यकर्ता के साथ-साथ उसके कवि भी हैं। ऐसा बहुत कम देखने में आ रहा है कि जिस मुद्दे के लिए आप लड़ते हों, उसके लिए इतनी प्रखरता और मुखरता से कविताएं भी लिखते हों।

श्री कैलाश सत्यार्थी, लोकमंच पत्रिका
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ओजस्‍वी कविताओं की रचना करते हैं श्री सत्‍यार्थी

श्री कैलाश सत्‍यार्थी की कविताओं के केंद्र में हैं बाल मजदूर। एक बाल अधिकार कार्यकर्ता होने के नाते वे बाल मजदूरों की मुक्ति और उनके अधिकारों का अपनी कविताओं में आह्वान करते हैं। उनकी विशेषता है कि वे बाल मजदूरों के दुख-दैन्‍य का दुखड़ा नहीं रोते हैं। कोई विलाप नहीं करते हैं बल्कि बाल मजदूरों में हुंकार भरते हैं। उनकी कविताएं इतनी ओजस्‍वी होती हैं कि खेतों-खलिहानों, ईंट-भट्ठों, कारखानों, कालीन उद्योगों में कराहते हजारों-लाखों बच्‍चे आजाद बचपन की तलाश में सड़क से संसद तक निकल पड़ते हैं। शोषित-पीडि़त बालक सपने संजोने लगते हैं। अपनी नष्‍ट इच्‍छाओं और आकांक्षाओं को पुनर्जीवित करने लगते हैं। सही मायने में मुक्ति (लिबरेशन) को अर्थ देती हैं उनकी कविताएं। मुक्ति का अहसास कराती हैं उनकी कविताएं-

‘‘फौलाद हो चुके हैं तुम्हारे पांव

और हाथ पहाड़ों की चोटियां

देखो कि तुम्हारा दिल समंदर बन गया है

आंखें, चांद और सूरज

आसमान से ऊंचा हो गया है

तुम्हारा मस्तक…’’

श्री सत्‍यार्थी ने बाल अधिकारों के लिए जब भी कोई बड़ा आंदोलन या संघर्ष खड़ा किया है, तो उन्‍होंने अपने साथियों को ऊर्जस्वित और प्रेरित करने के लिए ऐसी ओज भरी कविताओं की रचना की हैं। उनकी रचनाओं से आंदोलनकारियों का जोश और जज्‍बाआसमान छूने लगता है। विश्‍व इतिहास गवाह है कि कोई भी मुक्ति संग्राम या आंदोलन तब तक अपने गंतव्‍य की ओर अग्रसर नहीं हुआ है जब तक उसमें ऐसे क्रांति गीतों और कविताओं की रचना नहीं हुई है। इससे हम सहज ही अंदाजा लगा सकते हैं कि बाल अधिकारआंदोलनोंकी सफलता में उनकी कविताओं की कितनी प्रमुख भूमिका रहती होगी।

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सिलेक्टिव नहीं है श्री सत्‍यार्थी की संवेदना व करुणा

श्री सत्‍यार्थी की अमूमन कविताएं बहुजन समाज के दुख-दर्द-दैन्‍य और पीड़ा को अपना विषय बनाती हैं। जबकि श्री सत्‍यार्थी का जन्‍म एक गैर-बहुजन परिवार में हुआ है। यह बात अलग है कि जो बाल मजदूर होते हैं वे बहुजन समाज (अल्‍पसंख्‍यक, आदिवासी, दलित और पिछड़े वर्गों) से ही आते हैं। इसीलिए श्री सत्‍यार्थी सामान्‍य वर्ग में पैदा लेने वाले उन कवियों-लेखकों से विशिष्‍ट हो जाते हैं, जिनके सरोकार में बहुजन समाज कभी भी सीधे-सीधे शामिल नहीं हो पाता है। यह उल्‍लेखनीय है कि भारतीय साहित्‍य में दलित साहित्‍य, आदिवासी साहित्‍य और ओबीसी साहित्‍य का जो अस्तित्‍व या वर्गीकरण देखने में मिलता है वह कहीं न कहीं परोक्ष रूप से सामान्‍य वर्ग के कवियों-लेखकों की संकुचित सोच का भी जवाब है।समाज की तरह साहित्‍य में भी जब विभाजन हो गया हो और उसके बावजूद यदि श्री सत्‍यार्थी की संवेदना, करुणा, कर्तव्‍य और नैतिकता अन्‍य गैर बहुजन कवियों की तरह सिलेक्टिव नहीं हुई है, तब यह कहना पड़ेगा कि उनकी कविताएं सम्‍पूर्ण भारतीय साहित्‍य के लिए मशाल का काम कर रही हैं।श्री सत्‍यार्थी ने अपने को डी-क्‍लास और डी-कास्‍ट किया है और इसके पीछे उनके संघर्ष हैं। उनके बचपन और युवावस्‍था के 2-3 ऐसे दृष्‍टांत हैं जिनके जरिए पता चलता है कि उन्‍होंने सामाजिक संरचना पर पुरजोर तरीके से सवाल खड़े किए हैं और फिर उनमें तोड़-फोड़ भी की।

विविधता है श्री सत्‍यार्थी की कविताओं की विशेषता

श्री सत्‍यार्थी की कविताओं का रेंज बड़ा है। प्रकृति और जीवन की तरह उनकी कविताएं विविधताओं से भरी हुई हैं। बाल अधिकार, साम्‍प्रदायिक सदभाव, सामाजिक न्‍याय, महिला सशक्तिकरण, किसान-मजदूर, आपातकाल का विरोध, कर्मकांड-अंधविश्‍वास-सड़ी गली परंपरा पर हमला,प्रेम आदि विषयों पर उन्‍होंने महत्‍वपूर्ण कविताएं लिखी हैं।इस साल की शुरुआत में उन्‍होंने 3-4 ऐसी कविताएं लिखीं जो सोशल मीडिया पर काफी वायरल हुईं। ‘’मरेगा नहीं अभिमन्‍यु इस बार’’और ‘’इंद्रधनुष को सतरंगा ही रहने दो’’ जैसी कविताओं के माध्‍यम से उन्‍होंने दिल्ली में हुए सांप्रदायिकदंगो कापुरजोर विरोध किया,वहीं ‘’तेरा बेटा मरा नहीं है’’ और ‘’बिन मौसम के आया पतझड़’’ के जरिए उन्‍होंने कोरोना काल के दौरान हिन्‍दुस्‍तान की सड़कों की खाक छानते मजदूरों की दारुण दशा का मार्मिक चित्रण किया है। श्री सत्‍यार्थी साढ़े चार दशक से कविताएं लिख रहे हैं। आपातकाल के दौरान लिखी उनकी कुछ कविताएं चर्चा में भी आई थीं जिनमें उन्‍होंने आपातकाल का खुलकर विरोध किया है। श्री सत्‍यार्थी कर्मकांड-अंधविश्‍वास-सड़ी गली परंपरा पर हल्‍ला बोलते रहते हैं।

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उन्‍होंने अपनी पत्‍नी श्रीमती सुमेधा कैलाश को संबोधित प्रेम कविताएं भी लिखीहैं। उनकी प्रेम कविताओं में भी उनका सामाजिक सरोकार झलकता है। हमें यह नहीं भूलना चाहिए कि श्री सत्‍यार्थी यथार्थवादी कविता की उस परंपरा में आते हैं जहां प्रेम की कल्‍पना भी बगैर समाज, जीवन और संघर्ष के नहीं की जाती। यह कविता उन्होंने अपनी प्रेयसी, जो बाद में पत्नी बनी, सुमेधा कैलाश जी को लिख कर भेजा था…

‘’उजली इमारत के लाख दीये बेमानी,

चलो बनें एक दीया अंधियारी बस्ती का!

बाहर के साथ-साथ अंतस् का तम मिटे,

फर्क मिटे बूंद और सागर की हस्ती का!!’’

समर्पण और बलिदान उनकी प्रेम कविता की विशेषता है-

‘’कैसे कर लेती हो तुम ये कमाल

कभी धरती, कभी खाद या फिर

पानी बनकर कभी।

कैसे बन जाती हो तुम ही

कभी दिया, बाती, तो कभी तेल।‘’

श्री सत्‍यार्थी उन तमाम विषयों को अपनी कविताओं के दायरे में लाते हैं जो हमारे जीवन और दुनिया को प्रत्‍यक्ष और परोक्ष तरीके से प्रभावित करने की क्षमता रखते हैं। इस तरह से विविधता उनकी कविताओं की खूबसूरती और आकर्षण है।

श्री कैलाश सत्‍यार्थी समकालीन कविता की सारी विशेषताओं के साथ हमारे सामने प्रकट होते हैं। करुणा और नैतिक बल उनकी ताकत हैं। उनकी कविताओं को समझने के लिए मशक्‍कत करने की जरूरत नहीं पड़ती और आम लोगों की भाषा में कठिन से कठिन विषयों का चित्रण करने में उन्‍हें महारत हासिल है। लयात्‍मकता और गेयता के कारण ही उनकी कविताओं को संगीतबद्ध किया गया है और उन्‍हें विशेष अवसरों पर गाया भी जाता है। उनकी कविताओं में ऐसे-ऐसे बिम्‍बों और प्रतीकों का प्रयोग हुआ है जो दूर की कौड़ी नहीं लगते। आक्रोश, नाटकीयता और व्‍यंग्‍य उनकी कविताओं को धारदार बनाते हैं। श्री सत्‍यार्थी अपनी बात कहने के लिए कई बार मेटाफर (रूपक) का भी प्रयोग करते हैं। श्री सत्‍यार्थी का काव्‍य संसार रघुवीर सहाय की उस उक्ति को चरितार्थ करता है, जिसमें कहा गया है ‘’कला जीवन के लिए है, नहीं कि जीवन कला के लिए।’’

लेखक – पंकज चौधरी, प्रख्यात कवि व आलोचक

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