लोकमंच पत्रिका

लोकचेतना को समर्पित
साहित्यिक अनुवाद – अरुण कुमार

साहित्यिक कृतियों का अनुवाद, सामान्य अनुवाद से कठिन होता है। साहित्यिक अनुवादक को भावनाओं, सांस्कृतिक बारीकियों, स्वभाव और अन्य सूक्ष्म तत्वों का अनुवाद करने में भी सक्षम होना चाहिए। दो संस्कृतियों के बीच अनुवाद रूपी पुल के निर्माण में साहित्यिक अनुवाद का योगदान सबसे महत्वपूर्ण होता है। इसका कारण यह है कि किसी भौगोलिक क्षेत्र का साहित्य उस क्षेत्र की संस्कृति, कला और रीतियों का प्रतिबिम्ब होता है। कहा भी जाता है कि साहित्य समाज का दर्पण होता है। बस यही वह विशेषता है जो साहित्य के अनुवाद को कठिन बना देता है। किसी भी एक साहित्यिक कृति का अनुवाद करते समय बहुत सावधानियां बरतनी पड़ती हैं। ये सभी सावधानियां सांस्कृतिक भिन्नताओं के कारण समस्या का रूप ले लेती हैं। मूल रचना की भाषा में व्यक्त प्रतीकों, भावों और विशेषताओं को सही ढंग से लक्ष्य भाषा में उतारना होता है और साथ ही यह ध्यान रखना होता है कि अनूदित रचना पाठक को सहज और आत्मीय लगे। जब हम साहित्यिक अनुवाद की बात करते हैं तो हमारा आशय साहित्य की सभी विधाओं कहानी, उपन्यास, नाटक, निबन्ध, कविता, आत्मकथा, जीवनी आदि के अनुवाद से होता है। साहित्य की अलग-अलग विधाओं के अनुवाद के लिए अलग-अलग कौशल व अर्थ बोध की आवश्यकता होती है।

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नाटक का अनुवाद – हिन्दी रंगमंच के विकास में अनूदित नाटकों का महत्वपूर्ण स्थान है। विदेशी एवं भारतीय भाषाओं के अनेक नाटक हिन्दी में अनुवाद के माध्यम से ही आए हैं। उदाहरण के लिए विजय तेंदुलकर के ‘जात ही पूछो साधु की’, घासीराम कोतवाल, गिरीश कर्नाड का ‘तुगलक’, आदि नाटकों के हिन्दी में अनुवाद भी खूब लोकप्रिय हुए हैं। अंग्रेज़ी भाषा के नाटककार विलियम शेक्सपियर के नाटकों के हिन्दी में सौ से अधिक अनुवाद प्रकाशित हुए हैं। इनके अनुवाद प्रख्यात साहित्यकारों रांगेय राघव, रघुबीर सहाय और हरिवंश राय बच्चन ने किया है। अकेले रांगेय राघव ने ही विलियम शेक्सपियर के 15 नाटकों के हिन्दी में अनुवाद किए हैं। शेक्सपियर के अलावा अन्य प्रसिद्ध विदेशी नाटककारों इब्सन, काफ्का, कामू, चेखव, गोर्की आदि के नाटकों के हिन्दी में प्रचुर मात्रा में अनुवाद हुए हैं। नाटक जनसाधारण को सबसे अधिक प्रभावित करने वाली विधा है। साहित्य की अन्य विधाओं से नाटक इस मामले में अलग है क्योंकि यह एक दृश्य-श्रव्य विधा है। हम नाटक देखते भी हैं और सुनते भी हैं। नाटक में अभिनय भी होता है और संवाद भी।

एक नाटककार अभिनय और संवाद दोनों के बीच संतुलन बिठाकर ही लोकप्रिय नाटक की रचना करता है। यही कारण है कि नाटक का अनुवाद साहित्य की अन्य विधाओं से अलग होता है। नाटक की लेखन प्रक्रिया अलग होती है इसलिए इसके अनुवाद में भी विशेष सावधानी बरतनी पड़ती है। यह माना जाता है कि नाटक से जुड़ा हुआ व्यक्ति ही इसका अच्छा अनुवाद कर सकता है। नाटक के अनुवाद के लिए रंगमंच का व्यवहारिक ज्ञान होना बहुत जरूरी है। इसमें बहुत सारी तकनीकी बातें होती हैं जिनका ज्ञान अनुवादक को होना चाहिए। नाटक के अनुवाद में मूल नाटक के बिम्ब को लक्ष्य भाषा में उसी तरह या नजदीकी बिम्ब द्वारा अभिव्यक्त करना जरूरी होता है। अन्य विधाओं में लिखित पक्ष पर अधिक जोर दिया जाता है लेकिन नाटक में अभिनय और संवाद पक्ष अधिक महत्वपूर्ण होते हैं। नाटक के अनुवाद में संवाद और अभिनय दोनों के बीच द्वंद्व की स्थिति होती है। पहले पक्ष को पकड़ने की स्थिति में दूसरा पक्ष छूट जाता है और दूसरे पक्ष को पकड़ने की स्थिति में पहला पक्ष छूट जाता है। किसी भी परिस्थिति में जो अनुवादक दोनों पक्षों में संतुलन बिठा लेता है वही सफल हो जाता है।

नाटक के संवाद पक्ष में नाटकीय संकेत, मंचीय तत्व और गति संबंधी तत्व निहित होते हैं। एक अनुवादक को एक भाषा के संवाद को दूसरी भाषा के संवाद में रूपांतरित करना पड़ता है। यदि अनुवादक मूल नाटक को रंगमंच पर अभिनीत होते देखकर अनुवाद करता है तो वह अच्छा अनुवाद कर पाता है। वह संवादों को लक्ष्य भाषा में बोलकर अनुवाद करता है। संवादों में स्वराघात, वाक्य-विन्यास और बोलचाल की भाषा के आधार पर अनुवाद करना पड़ता है। किसी समाज विशेष के नाटकों में सांस्कृतिक स्तर पर स्वीकृत गुप्त भाषायी संकेत होते हैं जो कि चुटकुलों, अश्लील टिप्पणियों, स्थानीय व्यंग्यों आदि के रूप में व्यक्त होते हैं। इनका लक्ष्य भाषा की प्रकृति के अनुसार रूपांतरण करना पड़ता है।

कथा-साहित्य का अनुवाद- संरचना के आधार पर कथा-साहित्य एक संश्लिष्ट साहित्यिक विधा है अर्थात इसमें साहित्य के अन्य विधाओं के गुण भी मिले होते हैं। कथा साहित्य में नाटक के समान विभिन्न पात्र अपनी पृष्टभूमि और भाषा के द्वारा संवाद करते हैं। वे संवादों के माध्यम से अपने भावों को अभिव्यक्त करते हैं। कथा-साहित्य में कविता के भी गुण मौजूद होते हैं। कथा-साहित्य के अनुवादक को वे तमाम सावधानियां बरतनी पड़ती हैं जो सावधानियां कविता और नाटक के अनुवाद के समय बरतनी पड़ती हैं। वास्तव में अनुवाद शब्दों या वाक्यों का नहीं होता बल्कि भावों का होता है। भावों को अलग-अलग भाषाओं में अलग-अलग तरह से अभिव्यक्त किया जाता है इसलिए कथा-साहित्य का अनुवाद करते समय श्रोत भाषा में अभिव्यक्त भावों को लक्ष्य भाषा के अनुरूप परिवर्तित करना पड़ता है।

कथा-साहित्य में लेखक के अपने विचार मौजूद होते हैं। अनुवादक को मूल लेखक के विचार को अच्छी तरह समझना पड़ता है। इसके अभाव में वह लेखक के विचार को श्रोत भाषा से लक्ष्य भाषा में उपयुक्त ढंग से परिवर्तित नहीं कर पायेगा। कथा-साहित्य के अनुवाद में भाव-भंगिमाओं, अर्थ-छायाओं, लक्ष्यार्थ, व्यंग्यार्थ, प्रतीकों, बिम्बों, अलंकारों आदि का लक्ष्य भाषा की प्रकृति के अनुसार परिवर्तित करना पड़ता है। इन सबके लिए अनुवादक को श्रोत एवं लक्ष्य दोनों भाषाओं की प्रकृति, संबंधित समाज की संस्कृति का अच्छा ज्ञान होना चाहिए।

कविता और नाटक के अनुवाद के दौरान अनुवादक को पुन:सृजन की प्रक्रिया से गुजरना पड़ता है अर्थात अनुवाद मूल रचना को समझकर उसी के आधार पर एक अन्य रचना लिख देता है। इन दोनों ही विधाओं में अनुवादक को अधिक छूट प्राप्त होती है। इनमें मूल लेखक के साथ-साथ अनुवादक के व्यक्तित्व की भी स्पष्ट झलक मिलती है। कथा-साहित्य के अनुवाद में अनुवादक को अपेक्षाकृत कम छूट मिलती है। उसे मूल रचना के प्रति वफादारी निभानी पड़ती है अर्थात अनूदित रचना में मूल रचना को भी सहेजना पड़ता है। उसे श्रोत भाषा की सहजता, स्पष्टता और बोधगम्यता का भी ध्यान रखना पड़ता है।

कथा-साहित्य के अनुवाद का स्वरूप वर्णनात्मक होता है। अतः यह जरूरी होता है कि अनूदित रचना में वर्णनात्मकता का यह गुण बना भी रहे और वह रोचक भी रहे। सबसे पहले अनुवादक मूल रचना एवं मूल लेखक से तादात्म्य स्थापित करते हुए आत्मसात करता है। इसके बाद वह मूल रचना को अनूदित रचना में सही ढंग से रूपांतरित कर पाता है। ऐसा करते समय वह मूल रचना की वर्णनात्मकता को भी सुरक्षित रखता है.

कथा-साहित्य के अनुवाद में सर्वप्रथम मूल रचना के सांस्कृतिक परिवेश को लक्ष्य भाषा में पुन:सृजन करना पड़ता है। यह परिवेश विदेशी, भारतीय, आंचलिक, समसामयिक, तत्कालीन आदि हो सकता है। सांस्कृतिक परिवेश यदि विदेशी, आंचलिक और तत्कालीन है तो समस्या अधिक होती है. यदि परिवेश भारतीय एवं समकालीन हो तो अनवाद के समय समस्या कम होती है। मूल रचना के विदेशी परिवेश को अनुवाद में अभिव्यक्त करने के लिए अनुवादक दोनों समाजों और संस्कृतियों का अध्ययन करता है। विदेशी रचना के नामों, भौगोलिक नामों और अन्य सांस्कृतिक तत्वों का लक्ष्य भाषा के समाज के अनुरूप परिवर्तित करता है। ऐसा न करने पर लक्ष्य भाषा के पाठक को रसास्वादन में बाधा उत्पन्न होती है।

कुछ विद्वानों का मानना है कि मूल नामों को ज्यों-का-त्यों रखना चाहिए ताकि मूल संवेदना और परिवेश सुरक्षित रह सकें। अनुवाद का पठन-पाठन किसी अन्य देश की भाषा, संस्कृति और समाज से परिचित होने के लिए किया जाता है। यदि हम अमेरिका या अफ्रीका की कोई रचना अपनी भाषा में अनूदित रूप में पढ़ते हैं तो केवल इसलिए कि वहां के समाज व संस्कृति को जान सकें। नामों को बदल देने से हम इन सबसे वंचित रह जाते हैं। आजकल कुछ अनुवादक मूल नामों को बदल देते हैं लेकिन कुछ अनुवादक ऐसे भी हैं जो मूल नामों को नहीं बदलते हैं.

चिनुआ अचेबे अफ्रीका के महान साहित्यकार हैं। उनके कहानी संग्रह ‘गर्ल्स एट वार’ का हिन्दी में अनुवाद हरीश नारंग ने किया है। अफ्रीका के भिन्न सांस्कृतिक परिवेश को हिन्दी में उतारने के लिए नारंग ने खूब मेहनत की है। उदाहरण- It was one New Year’s Eve like this. You know how New Year can pass Christmas for jollity for we end-of-month people. By Christmas Day the month has reached twenty hungry but on New Year pocket is heavy.
प्रस्तुत वाक्यों में क्रिसमस और नव वर्ष के अवसर पर मौज-मस्ती करने के वातावरण का चित्रण है। इसका अनुवाद करने के लिए अफ्रीका के सांस्कृतिक परिवेश को समझना जरूरी है। इसमें वेतनभोगी वर्ग की समस्या निहित है। क्रिसमस के पहले ही जेब खाली हो चुकी होती है और नव वर्ष पर उनकी जेब में पैसे होते हैं। यहां यह समझना जरूरी है कि ‘twenty hungry’ शब्द आर्थिक तंगी का सूचक है। That night I was taking it easy on White Horse’ का अनुवाद करते समय हमें यह पता होना चाहिए कि White Horse एक ब्रांडेड शराब का नाम है। इसका अनुवाद होगा- उस रात मैं व्हाइट हॉर्स पी रहा था। 

राजेन्द्र सिंह बेदी के उर्दू उपन्यास ‘एक चादर मैली सी’ का अनुवाद हिन्दी, पंजाबी या अन्य उत्तर भारतीय भाषाओं में किया जाए तो अधिक कठिनाई नहीं होगी। यदि इसका अनुवाद दक्षिण भारतीय भाषाओं जैसे तमिल, मलयालम, कन्नड़ आदि में किया जाए तो कई कठिनाइयों का सामना करना पड़ सकता है। इस उपन्यास में मैली चादर का सम्बन्ध बड़े भाई की विधवा का छोटे भाई से शादी कर देने से है। यह प्रथा भारत के कुछ हिस्सों में प्रचलित है। यह प्रथा जहां नहीं प्रचलित है वहां के पाठकों को समझने में समस्या होगी। एक शब्द ‘सौत‘ में निहित बहु-विवाह का भाव भी इसी तरह की समस्या उत्पन्न कर सकता है। अनेक समाजों में बहु-विवाह की प्रथा प्रचलित है लेकिन हिन्दी के सौत शब्द में जो प्रतिद्वंद्विता, ईर्ष्या एवं अधिकार जैसे सूक्ष्म भाव मौजूद हैं उसे दूसरी भाषा में अभिव्यक्त करने में कठिनाई होती है। इसके अतिरिक्त मिथकीय, दार्शनिक, सामाजिक रूढ़ियों एवं सांकेतिक शब्दों के अर्थ को लक्ष्य भाषा में अभिव्यक्त करना भी बहुत कठिन होता है। 

कथा-साहित्य के अनुवाद की समस्याओं के संदर्भ में एक अन्य समस्या भाषा-प्रयोग के स्तर पर है। यह विधा चूंकि वर्णनात्मक विधा है इसलिए इसमें पठनीयता का गुण होना चाहिए। पठनीयता में रोचकता का गुण भी आवश्यक है और रोचकता के लिए भाषा में प्रवाह होना चाहिए। साहित्य में इसके लिए मुहावरों और लोकोक्तियों का प्रयोग किया जाता है। लम्बे वाक्यों को छोटे-छोटे वाक्यों में तोड़ने से भी भाषा के प्रवाह में गति आती है। कुछ उदाहरण – I could not make out anything का एक अनुवाद ‘मैं कुछ नहीं समझ सका’ होगा लेकिन यदि मेरे कुछ पल्ले नहीं पड़ा’ लिखें तो ज्यादा अच्छा होगा।
Better you get your daughter का अनुवाद होगा ‘अच्छा होगा यदि तुम अपनी लड़की की शादी कर दो’ लेकिन यदि ‘अब तुम्हें बेटी के हाथ पीले कर देने चाहिए’ लिखें तो हिन्दी भाषा की प्रकृति के अनुसार सही होगा. इसी तरह सिर पर पैर रखकर भागना, झख मारना, गला काट प्रतिस्पर्धा आदि का अनुवाद करना अनुवादक के लिए चुनौती भरा होता है।

कथा-साहित्य में देशज शब्दों का प्रचुर मात्रा में प्रयोग होता है। लेखक जब लोक-संस्कृति के चित्र उकेरता है तो क्षेत्रीय शब्दों का प्रयोग करता है। उदाहरण के लिए विद्यानिवास मिश्र के निबंधों में ‘बचकाना, सुभीता, बावली जैसे शब्दों के प्रयोग हुए हैं। इन शब्दों का अंग्रेज़ी में पर्याय खोजना थोड़ा मुश्किल हो जाता है। इसी तरह संस्कृतनिष्ठ शब्दों अंतर्मुखी, अभिभूत, अनाचारी आदि शब्दों के सम्पूर्ण अर्थ को व्यक्त करने वाले दूसरी भाषा के शब्दों को खोजने में कठिनाई होती है।

यह निर्विवाद है कि साहित्यिक अनुवाद एक कठिन कार्य है। इसके लिए अनुवादक में भी सृजनात्मक क्षमता का होना आवश्यक है।अनुवादक को एक कवि, नाटककार या कहानीकार की भांति भाषा की गहरी समझ होनी चाहिए। वास्तव में साहित्यिक अनुवाद मूल रचना की प्रक्रिया से दो बार गुजरने की है – पहली बार श्रोत भाषा में और दूसरी बार लक्ष्य भाषा में। इसमें अनुवादक का काम केवल भाषान्तर द्वारा अर्थ सम्प्रेषण से नहीं चल सकता उसे मूल रचना के भाव और शैली दोनों को सम्पूर्ण अर्थ के साथ पुन:सृजन करना पड़ता है.

काव्यानुवाद- कविता के अनुवाद को लेकर काफी विवाद है। अनेक विद्वानों का यह मानना है कि कविता का अनुवाद असंभव है। ऐसा इसलिए कहा जाता है कि कविता का अनुवाद साहित्य की सभी विधाओं से कठिन होता है। कविताओं के बहुत ही कम अनुवाद ऐसे हैं जो मूल का पूरी तरह कथ्य और कथन शैली दोनों ही दृष्टियों से प्रतिनिधित्व करते हैं। कविता का अनुवाद किसी कविता का निकटतम समतुल्य होता है। कभी वह मूल के काफी निकट पहुंच जाता है, कभी दूर और कभी बहुत दूर। वैसे तो प्रत्येक साहित्यिक विधा का अनुवाद कठिन होता है लेकिन उनमें भी कविता का अनुवाद अधिक कठिन होता है क्योंकि कविता अन्य विधाओं से अलग होती है। कविता में कुछ ऐसे तत्व होते हैं जिन्हें अनुवाद में ला पाना कठिन होता है।

कविता का जो प्रभाव पाठक या श्रोता पर पड़ता है वह न तो केवल कथ्य (Content) का होता है और न ही केवल कथन या अभिव्यक्ति शैली (Expression) का। वह दोनों का ही योग होता है. कविता में कथ्य और अभिव्यक्ति शैली दोनों एक दूसरे पर आश्रित होते हैं। कथ्य की विशिष्टता विशिष्ट अभिव्यक्ति पर और अभिव्यक्ति की विशिष्टता विशिष्ट कथ्य पर निर्भर करती है। प्रत्येक भाषा में भाषा में कथ्य और अभिव्यक्ति का संतुलन एक ही तरह से नहीं बैठाया जा सकता है। हर भाषा में कथ्य और अभिव्यक्ति के योग से एक जैसा प्रभाव भी नहीं उत्पन्न किया जा सकता है। यही कारण है कि कविता का अनुवाद करते समय मूल प्रभाव का या वह प्रभाव उत्पन्न करने वाले तत्व का कुछ अंश छूट जाता है और कुछ ऐसा अंश जुड़ जाता है जो मूल कविता में था ही नहीं। अनेक लोग इस जुड़ने को इस आधार पर आवश्यक मानते हैं कि इससे वह कमी पूरी हो गयी है जो कुछ छूट जाने के कारण उत्पन्न हुई थी। वास्तविकता यह है कि जोड़ने से अनुवाद में जान आ जाती है किंतु वह मूल से अधिक दूर हो जाता है। जो तत्व जुड़ते हैं वे वही नहीं होते जो छूट गए हैं, वे किसी-न-किसी रूप में उनसे अलग होते हैं। इसे ऐसे समझा जा सकता है – मान लिया जाए कि ‘क’ मूल कविता है, ‘ख’ अनुवाद में छूट गए तत्व हैं और ‘ग’ अनुवाद की प्रक्रिया में जोड़े गए तत्व हैं। स्पष्ट ही ( क – ख ) क के अधिक निकट है अपेक्षाकृत ( क – ख )+ ग के। फिट्ज़जेराल्ड ने उमर खय्याम की रुबाइयों का अनुवाद करते समय उसमें बहुत कुछ जोड़ दिया है। उन्होंने कहा है कि कविता का अनुवाद करते समय अनुवादक को अपनी रुचि के अनुसार मूल को फिर से ढालना चाहिए- भूसा भरे गिद्ध की अपेक्षा मैं जीवित गौरेया चाहूंगा। इस तरह वे जोड़ने के पक्षपाती हैं। यह स्पष्ट है कि इस छूट जाने से अनुवाद मूल से दूर हो जाता है और जुड़ जाने से और अधिक दूर हो जाता है। अतः यह अनुवाद से अधिक मूल पर आधारित नई रचना सा हो जाता है।

बोरिस पास्तरनाक की कविता The Wind का धर्मवीर भारती द्वारा किया गया है. यह अनुवाद छोड़ने और जोड़ने का अच्छा उदाहरण है- 

This is the end of me but you live on

The wind crying and complaining,

Rocks the house and the forest, 

Not each pine tree separately

With the whole boundless distance

मैं व्यतीत हुआ, पर तुम अभी हो, रहो।

हवा, चीखती चिल्लाती हुई हवा-झकझोर रही है

मकानों को, जंगलों को

चीड़ के अलग-अलग पेड़ों को नहीं

वरन सबों को एक साथ-

तमाम सीमाहीन दूरियों को

काव्यानुवाद की समस्याएं-  

( क ) श्रोत भाषा के सभी शब्दों के लिए लक्ष्य भाषा में प्राप्त शब्द आंतरिक, बाह्य तथा प्रभाव की दृष्टि से हमेशा समान नहीं होते।

(ख ) अलंकारों का अनुवाद बहुत कठिन होता है और कभी-कभी असंभव हो जाता है।

( ग) काव्यानुवाद में छंदों की स्थिति भी बहुत जटिल होती है। इनको श्रोत भाषा से लक्ष्य भाषा में रूपांतरित करना बहुत कठिन है।

(घ) कविता का अनुवाद एक कवि ही कर सकता है। जब एक कवि किसी कविता का अनुवाद करता है तो उसकी काव्य प्रतिभा भी अनुवाद पर हावी हो जाती है।

(च ) काव्य का अर्थ और उसकी अभिव्यक्ति को अनुवाद में संतुलित रूप से उतारना भी कठिन है।

एक कवि कविता लिखते समय शब्दों का प्रयोग चुन कर करता है। वे शब्द अपने कोशीय अर्थ के अलावा अलग अर्थ भी देते हैं। ध्वनि और अर्थ का यह सम्बन्ध उन चुने हुए शब्दों की विशेषता होती है। इन शब्दों के कारण कविता जीवंत हो जाती है। अनुवाद में उस शब्द का प्रतिशब्द कोशीय अर्थ ही दे पाता है। मान लिया जाए कि किसी कविता में ‘बिजली’ शब्द आया है। स्पष्ट है बिजली में ‘तेजी’ और ‘तरलता’ की भी ध्वनि है। इसका अनुवाद अंग्रेज़ी में करते समय हमें Thunder, Thunderbolt और Lightning शब्द मिलते हैं। यदि Thunder रखें तो इनमें ‘कड़क’ की ध्वनि है और Lightning रखें तो ‘चकाचौंध’ की। किसी कविता में ‘बिजली’ शब्द का अनुवाद ये शब्द नहीं हो सकते। सामान्य भाषा में हो सकता है। यदि बिजली शब्द का अनुवाद इन्हीं शब्दों से करें तो मूल की ‘तेजी’ और ‘तरलता’ चली गई और नए तत्व ‘कड़क’ या ‘चकाचौंध’ जुड़ गए। अर्थात कुछ छूट गया और कुछ जुड़ गया।

प्रत्येक भाषा के प्रत्येक शब्द का अपना अर्थ बिम्ब होता है जो सांस्कृतिक, भौगोलिक तथा सामाजिक पृष्ठभूमि से सम्बद्ध होता है। दूसरी भाषा का उसी का समानार्थी शब्द उस पृष्ठभूमि से युक्त न होने के कारण वैसा अर्थ बिम्ब नहीं प्रस्तुत कर पाता है। किसी अंग्रेज़ी कवि की कविता में प्रयुक्त Spring शब्द का ठीक प्रतिशब्द हिन्दी में वसंत इसलिए नहीं हो सकता क्योंकि अंग्रेज़ी भाषी के मन में स्प्रिंग शब्द से इंग्लैंड के स्प्रिंग’ का बिम्ब उभरता है न कि भारत के वसंत का। ऐसे ही रूस का ‘जाड़ा’ और अरब का ‘जाड़ा’ एक नहीं हो सकता और न ही भारत की ‘गर्मी’ और अफ्रीका की ‘गर्मी’। कविता में प्रयुक्त इन शब्दों के लिए दूसरी भाषा के समानार्थी शब्दों का प्रयोग नहीं किया जा सकता। यदि किया जाता है तो अनूदित कविता मूल कविता से दूर हो जाती है.

कविता की भाषा अलंकार प्रधान होती है। एक भाषा के अलंकार को दूसरी भाषा में रूपांतरित करना कठिन है. यह कार्य कभी-कभी असंभव हो जाता है। उदाहरण के रूप में ‘उल्लू’ शब्द को लिया जा सकता है। भारत में उल्लू मूर्खता का प्रतीक है लेकिन अंग्रेज़ी में उल्लू बुद्धिमान का। अब उल्लू शब्द का अनुवाद Owl नहीं किया जा सकता है। ‘कनक कनक ते सौ गुनी’ का किसी भाषा में अनुवाद तब तक नहीं किया जा सकता है जब तक सोना और धतूरा के लिए एक ही शब्द न मिल जाएं। रहीम का एक दोहा है- रहिमन पानी राखिए बिन पानी सब सून।/ पानी गए न ऊबरे मोती मानस चून। इस दोहा में चमक, इज्जत और पानी तीन-तीन अर्थ वाला एक शब्द किसी भाषा में नहीं मिलेगा। अतः इसका सही अनुवाद अत्यंत कठिन है.

कविता छंद बद्ध होती है और प्रत्येक छंद की अपनी गति होती है। उसका अपना अलग प्रभाव भी होता है। भारतीय भाषाओं में अलग तरह के छंदों का प्रयोग होता है तो फ़ारसी में अलग और अंग्रेज़ी में अलग। एक भाषा के छंद को दूसरी भाषा में अनुवाद करना एक बड़ी समस्या है। एक अनुवादक यदि लक्ष्य भाषा के छंद में मूल छंद का अनुवाद कर दे तो मूल कविता का प्रभाव ही समाप्त हो जाता है। मूल छंद का जो प्रभाव मूल भाषा भाषियों पर पड़ता है , अनुवादक किसी भी तरह से वही प्रभाव लक्ष्य भाषा भाषी पर नहीं डाल सकता। यही कारण है कि एक ही कविता का अनुवाद अलग-अलग व्यक्ति अलग-अलग ढंग से करते हैं।

लेखक- डॉ अरुण कुमार, असिस्टेंट प्रोफ़ेसर, लक्ष्मीबाई महाविद्यालय, दिल्ली विश्वविद्यालय व सम्पादक, लोकमंच पत्रिका. सम्पर्क – 08178055172, 09868719955, lokmanchpatrika@gmail.com

41 thoughts on “साहित्यिक अनुवाद – अरुण कुमार

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