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वाक्य विचार: परिभाषा, भेद और उदाहरण- अरुण कुमार

हिन्दी व्याकरण के तीन भाग हैं: वर्ण, शब्द एवं वाक्य विचार। वाक्य विचार हिन्दी व्याकरण का तीसरा भाग है। इसके अंतर्गत वाक्य, वाक्य के भेद, विराम चिन्ह, वाक्य शुद्धि, मुहावरे तथा लोकोक्तियों आदि का अध्धयन किया जाता है।

वाक्य :

शब्दों का ऐसा सार्थक समूह जिससे वक्ता या लेखक की पूरी बात श्रोता या पाठक को समझ में आ जाए, वाक्य कहलाता है। दूसरे शब्दों में कहें तो सार्थक शब्दों का व्यवस्थित समूह जिससे अपेक्षित अर्थ प्रकट हो, वाक्य कहलाता है। जैसे- राम आम खाता है।

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वाक्य के अंग

किसी भी वाक्य के दो अंग होते हैं – उद्देश्य और विधेय

उद्देश्य: किसी वाक्य में जिसके बारे में कुछ बताया जाता है, उसे उद्देश्य कहते हैं। जैसे मोहन खेलता है। इस वाक्य में मोहन के बारे में बताया गया है, अतः यह उद्देश्य है। उद्देश्य के रूप में संज्ञा, सर्वनाम, विशेषण, क्रिया-विशेषण क्रियाद्योतक और वाक्यांश आदि आते हैं। जैसे-

संज्ञा- मोहन गेंद खेलता है।

सर्वनाम- वह घर जाता है।

विशेषण- बुद्धिमान सदा सच बोलते हैं।

क्रिया-विशेषण- पीछे मत देखो।

क्रियार्थक संज्ञा- तैरना एक अच्छा व्यायाम है।

वाक्यांश- भाग्य के भरोसे बैठे रहना कायरों का काम है।

कृदन्त- लकड़हारा लकड़ी बेचता है।

उद्देश्य के भाग-

उद्देश्य के दो भाग होते है- (i) कर्ता, (ii) कर्ता का विशेषण या कर्ता से संबंधित शब्द।

उद्देश्य का विस्तार
उद्देश्य की विशेषता प्रकट करने वाले शब्द या शब्द-समूह को उद्देश्य का विस्तार कहते हैं। उद्देश्य के विस्तारक शब्द विशेषण, सम्बन्धवाचक, समानाधिकरण, क्रियाद्योतक और वाक्यांश आदि होते हैं। जैसे-

1. विशेषण- ‘दुष्ट’ लड़के ऊधम मचाते हैं।

2. सम्बन्धकारक- ‘मोहन का’ घोड़ा घास खाता है।

3. विशेषणवत्प्रयुक्त शब्द- ‘सोये हुए’ शेर को जगाना अच्छा नहीं होता।

4. क्रियाद्योतक- ‘खाया मुँह और नहाया बदन’ छिपता नहीं है। ‘दौड़ता हुआ’ बालक गिर गया।

5. वाक्यांश- ‘दिन भर का थका हुआ’ लड़का लेटते ही सो गया।

6. प्रश्न से- ‘कैसा’ काम होता है ?

7. सम्बोधन- ‘हे राम!’ तुम क्या कर रहे हो ?

विशेष- सम्बोधन का प्रयोग ऐसे वाक्यों में भी होता है, जहाँ वाक्य का कर्त्ता और सम्बोधित व्यक्ति भिन्न-भिन्न होते हैं। जैसे- हे गरुड़ ! राम की माया ही ऐसी है ! इस वाक्य में ‘गरुड़‘ तथा वाक्य का कर्त्ता ‘माया’ भिन्न-भिन्न हैं। ऐसे वाक्यों में सम्बोधन के बाद ‘तुम सुनो’ आदि छिपा रहता है, ये सम्बोधन ‘तू’, ‘तुम’ अथवा ‘आप’ के विस्तार होते हैं।

विधेय: वाक्य के उद्देश्य के बारे में जो कुछ कहा जाता है, उसे विधेय कहते हैं। जैसे मोहन ‘खेलता है’। रमेश ‘दौड़ता है’ इन वाक्यों में ‘खेलता है’ और ‘दौड़ता है’ विधेय है। दूसरे शब्दों में इसे ऐसे भी समझा जा सकता है कि वाक्य से उद्देश्य को अलग करने के बाद जो भी बचता है उसे विधेय कहा जाता है।

इसके अंतर्गत विधेय का विस्तार आता है। जैसे- लंबे-लंबे बालों वाली लड़की ‘अभी-अभी एक बच्चे के साथ दौड़ते हुए उधर गई’। इस वाक्य में विधेय (गई) का विस्तार ‘अभी-अभी एक बच्चे के साथ दौड़ते हुए उधर’ है।

विशेष- आज्ञासूचक वाक्यों में विद्येय तो होता है किन्तु उद्देश्य छिपा होता है।
जैसे- वहाँ जाओ। खड़े हो जाओ। इन दोनों वाक्यों में जिसके लिए आज्ञा दी गयी है वह उद्देश्य अर्थात ‘वहाँ न जाने वाला ‘(तुम) और ‘खड़े हो जाओ’ (तुम या आप) अर्थात उद्देश्य दिखाई नही पड़ता वरन छिपा हुआ है।

विधेय के भाग-

विधेय के छः भाग होते है-
(i) क्रिया, (ii) क्रिया के विशेषण, (iii) कर्म, (iv) कर्म के विशेषण या कर्म से संबंधित शब्द, (v) पूरक और (vi) पूरक के विशेषण।

विधेय दो प्रकार के होते हैं। (i) साधारण विधेय (ii) जटिल विधेय

(i) साधारण विधेय- साधारण विधेय में केवल एक क्रिया होती है। जैसे- राम पढ़ता हैं। वह लिखती है।

(ii) जटिल विधेय- जब विधेय के साथ पूरक शब्द प्रयुक्त होते हैं, तो विधेय को जटिल विधेय कहते हैं।

पूरक के रूप में आनेवाला शब्द संज्ञा, विशेषण, सम्बन्धवाचक तथा क्रिया-विशेषण होता हैं। जैसे-

1. संज्ञा : मेरा बड़ा भाई ‘दुकानदार’ है।

2. विशेषण : वह आदमी ‘सुस्त’ है।

3. सम्बन्धवाचक : ये पाँच सौ रुपये ‘तुम्हारे’ हुए।

4. ‘क्रिया-विशेषण’ : आप ‘कहाँ’ थे।

विधेय का विस्तार :- विधेय की विशेषता प्रकट करने वाले शब्द-समूह को ‘विधेय का विस्तार’ कहते हैं। विधेय का विस्तार निम्नलिखित प्रकार से होते हैं-

1. कर्म द्वारा : वह ‘रामायण’ पढ़ता है।

2. विशेषण द्वारा : वह ‘प्रसन्न’ हो गया।

3. क्रिया-विशेषण द्वारा : मोहन ‘धीरे-धीरे’ पढ़ता है।

4. सम्बन्धसूचक द्वारा : नाव यात्रियों ‘सहित’ डूब गया।

5. क्रियाद्योतक द्वारा : वह हाथ में ‘गेंद लिए’ जाता है।

6. क्रियाविशेषणवत् प्रयुक्त शब्द द्वारा : वह ‘अच्छा’ गाता है।

7. पूर्वकालिक क्रिया द्वारा : मोहन ‘पढ़कर’ सो गया।

8. पद वाक्यांश द्वारा : ‘मोहन भोजन करने के बाद ही’ सो गया।

कुछ कारकों के द्वारा- (कर्त्ता, कर्म और सम्बन्ध के अतिरिक्त)

(क) करण कारक : राम ने रावण को ‘वाण’ से मारा।

(ख) सम्प्रदान कारक : राम ने ‘दरिद्रों के लिए’ घर छोड़ा।

(ग) अपादान कारक : वह ‘पेड़ से’ गिर पड़ा।

(घ) अधिकरण कारक : हनुमान जी ‘राक्षसों पर’ टूट पड़े।

नीचे दी गई तालिका से उद्देश्य तथा विधेय को समझा जा सकता है-

वाक्यउद्देश्यविधेय
गाय घास खाती हैगायघास खाती है।
काली गाय हरी घास खाती है।काली गायहरी घास खाती है।

काली – कर्ता विशेषण, गाय – कर्ता [उद्देश्य], हरी – विशेषण कर्म, घास -कर्म [विधेय], खाती है– क्रिया [विधेय]

वाक्य के प्रकार :- 

शब्द और अर्थ के आधार पर वाक्य को दो भागो में विभाजित किया जाता है –

अर्थ के आधार पर-

अर्थ के आधार पर हिन्दी में वाक्य के आठ प्रकार होते हैं –

विधानवाचक वाक्य – जिन वाक्य से क्रिया के करने या होने की सूचना मिलती है, उन्हें विधान वाचक वाक्य कहते हैं। जैसे मैंने पानी पिया। वर्षा हो रही है। मोहन पढ रहा है।

निषेधवाचक वाक्य – जिन वाक्यों से कार्य ना होने का भाव प्रकट होता है, उन्हें निषेधवाचक वाक्य कहते हैं। जैसे- राम ने खाना नहीं खाया। वहां मत जाओ।

आज्ञा वाचक – जिन वाक्यों से आज्ञा, प्रार्थना आदि का बोध होता है, उन्हें आज्ञा वाचक वाक्य कहते हैं। जैसे एक गिलास पानी लाओ. खड़े हो जाओ |

प्रश्नवाचक वाक्य जिन वाक्यों से किसी प्रकार का प्रश्न पूछने का बोध होता है, उन्हें प्रश्नवाचक वाक्य कहते हैं। जैसे तुम कहाँ गए थे? राम क्या करता है?

इच्छा वाचक वाक्य – जिन वाक्यों से इच्छा, आशीष एवं शुभकामना आदि का बोध हो, उन्हें इच्छा वाचक वाक्य कहते हैं। जैसे- भगवान आपको लंबी उम्र दें। आज मैं जमकर खाऊंगा।

संदेह वाचक वाक्य – जिन वाक्यों से संदेह या संभावना व्यक्त होती है, उन्हें संदेह वाचक वाक्य कहते हैं। जैसे आज वर्षा होगी हो सकती है। हो सकता है कि वह आज स्कूल आए |

संकेतवाचक वाक्य – जिन वाक्यों में एक क्रिया का होना दूसरी क्रिया पर निर्भर होता है, उन्हें संकेतवाचक वाक्य कहते हैं। जैसे- अगर वर्षा होगी तो फसल भी ठीक होगा। आज अगर पिताजी जीवित होते तो सब ठीक होता।

विस्मयवाचक वाक्य – जिन वाक्यों से आश्चर्य, घृणा, क्रोध, शोक आदि का भाव प्रकट हो, उन्हें विस्मयवाचक वाक्य कहते हैं। इसे ‘!’ चिह्न के साथ लिखा जाता है। जैसे- शाबाश! तुमने यह मुश्किल कार्य कर दिखाया |

रचना के आधार पर वाक्य के भेद –

रचना के आधार पर वाक्य के तीन भेद होते हैं – साधरण वाक्य, मिश्रित वाक्य और संयुक्त वाक्य

(i) साधरण वाक्य – ऐसे वाक्य जिनमें एक ही क्रिया होती है और एक कर्ता होता है, उन्हें साधारण वाक्य कहते हैं। दूसरे शब्दों में कहें तो जिन वाक्यों में केवल एक ही उद्देश्य और एक ही विधेय होता है, उन्हें साधारण वाक्य कहते हैं।जैसे- बिजली चमकती है. पानी बरसता है.

(ii) मिश्रित वाक्य – जिस वाक्य में एक से अधिक वाक्य उपस्थित हों किन्तु एक प्रधान उपवाक्य तथा शेष आश्रित उपवाक्य हों, मिश्रित वाक्य कहलाता है।
दूसरे शब्दों में कहें तो जिस वाक्य में मुख्य उद्देश्य और मुख्य विधेय के अलावा एक या अधिक समापिका क्रियाएँ हों, उसे ‘मिश्रित वाक्य’ कहते हैं। मेरा विश्वास है कि मैच भारत जीतेगा। इस वाक्य में ‘मेरा विश्वास है कि’ तथा ‘सफल वही होता है’ मुख्य उपवाक्य हैं और ‘भारत जीतेगा’ तथा ‘जो परिश्रम करता है’ गौण उपवाक्य। इसलिए ये मिश्र वाक्य हैं।

दूसरे शब्दों मेें कहें तो जिन वाक्यों में एक प्रधान उपवाक्य हो और अन्य आश्रित उपवाक्य हों और वे आपस में ‘कि’; ‘जो’; ‘क्योंकि’; ‘जितना’; ‘उतना’; ‘जैसा’; ‘वैसा’; ‘जब’; ‘तब’; ‘जहाँ’; ‘वहाँ’; ‘जिधर’; ‘उधर’; ‘अगर/यदि’; ‘तो’; ‘यद्यपि’; ‘तथापि’; आदि से जुड़े हों उन्हें मिश्रित वाक्य कहते हैं।

मिश्रित वाक्य मे एक मुख्य उद्देश्य और मुख्य विधेय के अलावा एक से अधिक समापिका क्रियाएँ होती है। जैसे- मैं जनता हूँ कि तुम्हारे अक्षर अच्छे नहीं बनते। जो लड़का कमरे में बैठा है वह मेरा भाई है। यदि परिश्रम करोगे तो उत्तीर्ण हो जाओगे।

‘मिश्र वाक्य’ के ‘मुख्य उद्देश्य’ और ‘मुख्य विधेय’ से जो वाक्य बनता है, उसे ‘मुख्य उपवाक्य’ और दूसरे वाक्यों को आश्रित उपवाक्य’ कहते हैं। पहले को ‘मुख्य वाक्य’ और दूसरे को ‘सहायक वाक्य’ भी कहते हैं। सहायक वाक्य अपने में पूर्ण या सार्थक नहीं होते, पर मुख्य वाक्य के साथ आने पर उनका अर्थ निकलता हैं।

(iii) संयुक्त वाक्य – जिस वाक्य में दो या दो से अधिक उपवाक्य मिले हों, परन्तु सभी वाक्य प्रधान हो तो ऐसे वाक्य को संयुक्त वाक्य कहते है। दूसरे शब्दो में कहें तो जिन वाक्यों में दो या दो से अधिक सरल वाक्य योजकों (और, एवं, तथा, या, अथवा, इसलिए, अतः, फिर भी, तो, नहीं तो, किन्तु, परन्तु, लेकिन, पर आदि) से जुड़े हों, उन्हें संयुक्त वाक्य कहते है।  जिस वाक्य में साधारण अथवा मिश्र वाक्यों का मेल संयोजक अवयवों द्वारा होता है, उसे संयुक्त वाक्य कहते हैं। जैसे- वह शाम को गया और सुबह लौट आया। प्रिय बोलो पर असत्य नहीं।

संयुक्त वाक्य उसे कहते हैं, जिसमें दो या दो से अधिक सरल वाक्य अथवा मिश्र वाक्य अव्ययों द्वारा मिले हुए हों। जैसे- ‘मैं चावल खाकर लेटा कि पेट में दर्द होने लगा, और दर्द इतना बढ़ा कि तुरन्त डॉक्टर को बुलाना पड़ा।’ इस लम्बे वाक्य में संयोजक ‘और’ है, जिसके द्वारा दो मिश्र वाक्यों को मिलाकर संयुक्त वाक्य बनाया गया।

इसी प्रकार ‘मैं आया और वह गया’ इस वाक्य में दो सरल वाक्यों को जोड़नेवाला संयोजक ‘और’ है। संयुक्त वाक्य में प्रत्येक वाक्य की अपनी स्वतन्त्र सत्ता होती है. वे एक-दूसरे पर आश्रित नहीं होते. संयोजक अव्यय उन वाक्यों को मिलाते हैं। इन मुख्य और स्वतन्त्र वाक्यों को व्याकरण में ‘समानाधिकरण’ उपवाक्य’ भी कहते हैं।

वाक्य के अनिवार्य तत्व- किसी भी वाक्य में निम्नलिखित छः अनिवार्य तत्व होते हैं – सार्थकता, योग्यता, आकांक्षा, निकटता, क्रम और अन्वय

(1) सार्थकता सार्थकता किसी भी वाक्य का प्रमुख गुण है। इसके लिए आवश्यक है कि वाक्य में सार्थक शब्दों का ही प्रयोग हो. जैसे- मोहन पानी खाता है। इस वाक्य में ‘पानी खाना ‘ सार्थकता का बोध नहीं कराता. सार्थकता की दृष्टि से यह वाक्य अशुद्ध माना जाएगा।

(2) योग्यता   किसी भी वाक्य में प्रसंग के अनुकूल भावों का बोध कराने वाली योग्यता या क्षमता होनी चाहिए। इसके अभाव में वाक्य अशुद्ध हो जाता है।
जैसे- हिरण उड़ता है। यहाँ हिरण और उड़ने की परम्पर योग्यता नहीं है, अतः यह वाक्य अशुद्ध है।

(3) आकांक्षा– आकांक्षा का अर्थ है- इच्छा। एक पद को सुनने के बाद दूसरे पद को जानने की इच्छा ही ‘आकांक्षा’ है। यदि वाक्य में आकांक्षा शेष रह जाती है तो उसे अधूरा वाक्य माना जाता है; क्योंकि उससे अर्थ पूर्ण रूप से अभिव्यक्त नहीं हो पाता है। जैसे- यदि कहा जाय ‘खाता है’ तो बात स्पष्ट नहीं हो पा रही है कि क्या कहा जा रहा है- किसी के भोजन करने की बात कही जा रही है या बैंक के खाते के बारे में ?

(4) निकटता बोलते तथा लिखते समय वाक्य के शब्दों में परस्पर निकटता का होना बहुत आवश्यक है, रूक-रूक कर बोले या लिखे गए शब्द वाक्य नहीं बनाते। अतः वाक्य के पद निरंतर प्रवाह में पास-पास बोले या लिखे जाने चाहिए। जैसे- गंगा……………….. पश्चिम से …………………………………. पूरब की ओर बहती है। यह लिखना सही नहीं है. इसे ऐसे लिखना चाहिए- गंगा पश्चिम से पूरब की ओर बहती है।

(5) क्रम  क्रम से तात्पर्य है- पदक्रम। सार्थक शब्दों को भाषा के नियमों के अनुरूप क्रम में रखना चाहिए। वाक्य में शब्दों के अनुकूल क्रम के अभाव में अर्थ का अनर्थ हो जाता है। जैसे- नाव में नदी है। इस वाक्य में सभी शब्द सार्थक हैं, फिर भी क्रम के अभाव में वाक्य गलत है। सही क्रम करने पर नदी में नाव है वाक्य बन जाता है, जो शुद्ध है।

(6) अन्वय  अन्वय का अर्थ है कि पदों में व्याकरण की दृष्टि से लिंग, पुरुष, वचन, कारक आदि का सामंजस्य होना चाहिए। अन्वय के अभाव में वाक्य अशुद्ध हो जाता है। जैसे- सुरेश का लड़का का हाथ में बन्दूक था। इस वाक्य में भाव तो स्पष्ट है लेकिन व्याकरणिक सामंजस्य नहीं है। अतः यह वाक्य अशुद्ध है। यदि इसे सुरेश के लड़के के हाथ में बन्दूक थी, कहें तो वाक्य व्याकरणिक दृष्टि से शुद्ध होगा।

वाक्य-विग्रह –

वाक्य के विभिन्न अंगों को अलग-अलग किये जाने की प्रक्रिया को वाक्य-विग्रह कहते हैं। इसे ‘वाक्य-विभाजन’ या ‘वाक्य-विश्लेषण’ भी कहा जाता है। सरल वाक्य का विग्रह करने पर एक उद्देश्य और एक विद्येय बनते हैं। संयुक्त वाक्य में से योजक को हटाने पर दो स्वतंत्र उपवाक्य (यानी दो सरल वाक्य) बनते हैं। मिश्र वाक्य में से योजक को हटाने पर दो अपूर्ण उपवाक्य बनते है।

सरल वाक्य = 1 उद्देश्य + 1 विद्येय

संयुक्त वाक्य = सरल वाक्य + सरल वाक्य

मिश्र वाक्य = प्रधान उपवाक्य + आश्रित उपवाक्य

वाक्यों का रूपान्तरण

किसी वाक्य में अर्थ परिवर्तन किए बिना उसकी संचरना में परिवर्तन करना वाक्यों का रूपान्तरण कहलाती है। एक प्रकार के वाक्य को दूसरे प्रकार के वाक्यों में बदलना वाक्य परिवर्तन या वाक्यों का रूपांतरण कहलाता है। किसी वाक्य के अर्थ में परिवर्तन किए बिना वाक्य की रचना में परिवर्तन किया जा सकता है। सरल वाक्यों से संयुक्त अथवा मिश्र वाक्य बनाए जा सकते हैं। इसी प्रकार संयुक्त अथवा मिश्र वाक्यों को सरल वाक्यों में बदला जा सकता है। ध्यान रखिए कि इस परिवर्तन के कारण कुछ शब्द, योजक चिह्न या संबंधबोधक लगाने या हटाने पड़ सकते हैं। वाक्य परिवर्तन की प्रक्रिया में वाक्य का केवल प्रकार बदला जाता है, उसका अर्थ या काल आदि नहीं।

वाक्य परिवर्तन करते समय ध्यान रखने योग्य बातें

(i) केवल वाक्य रचना बदलनी चाहिए, अर्थ नहीं।

(ii) सरल वाक्यों को मिश्र या संयुक्त वाक्य बनाते समय कुछ शब्द या सम्बन्धबोधक अव्यय अथवा योजक आदि से जोड़ना। जैसे- क्योंकि, कि, और, इसलिए, तब आदि।

(iii) संयुक्त/मिश्र वाक्यों को सरल वाक्यों में बदलते समय योजक शब्दों या सम्बन्धबोधक अव्ययों का लोप करना।

सरल वाक्य से संयुक्त वाक्य में परिवर्तन-

(1) सरल वाक्य- बीमार होने के कारण वह परीक्षा में सफल नहीं हो सका।
संयुक्त वाक्य- वह बीमार था और इसलिए परीक्षा में सफल नहीं हो सका।

(2) सरल वाक्य- सुबह होने पर कुहासा जाता रहा।
संयुक्त वाक्य- सुबह हुआ और कुहासा जाता रहा।

(3) सरल वाक्य- गरीब को लूटने के अतिरिक्त उसने उसकी हत्या भी कर दी।
संयुक्त वाक्य- उसने न केवल गरीब को लूटा, बल्कि उसकी हत्या भी कर दी।

संयुक्त वाक्य से सरल वाक्य में परिवर्तन

(1) संयुक्त वाक्य- सुबह हुई और कुहासा जाता रहा।
सरल वाक्य- सुबह होने पर कुहासा जाता रहा।

(2) संयुक्त वाक्य- जल्दी चलो, नहीं तो पकड़े जाओगे।
सरल वाक्य- जल्दी न चलने पर पकड़े जाओगे।

(3) संयुक्त वाक्य- वह अमीर है फिर भी सुखी नहीं है।
सरल वाक्य- वह अमीर होने पर भी सुखी नहीं है।

सरल वाक्य से मिश्र वाक्य में परिवर्तन-

(1) सरल वाक्य- उसने अपने मित्र का मकान खरीदा।
मिश्र वाक्य- उसने उस मकान को खरीदा, जो उसके मित्र का था।

(2) सरल वाक्य- अच्छे लड़के परिश्रमी होते हैं।
मिश्र वाक्य- जो लड़के अच्छे होते है, वे परिश्रमी होते हैं।

(3) सरल वाक्य- लोकप्रिय कवि का सम्मान सभी करते हैं।
मिश्र वाक्य- जो कवि लोकप्रिय होता है, उसका सम्मान सभी करते हैं.

मिश्र वाक्य से सरल वाक्य में परिवर्तन

(1) मिश्र वाक्य- उसने कहा कि मैं निर्दोष हूँ।
सरल वाक्य- उसने अपने को निर्दोष घोषित किया।

(2) मिश्र वाक्य- मुझे बताओ कि तुम्हारा जन्म कब और कहाँ हुआ था।
सरल वाक्य- तुम मुझे अपने जन्म का समय और स्थान बताओ।

(3) मिश्र वाक्य- जो छात्र परिश्रम करेंगे, उन्हें सफलता अवश्य मिलेगी।
सरल वाक्य- परिश्रमी छात्र अवश्य सफल होंगे।

संयुक्त वाक्य से मिश्र वाक्य में परिवर्तन

(1) संयुक्त वाक्य- सूर्य निकला और कमल खिल गए।
मिश्र वाक्य- जब सूर्य निकला, तो कमल खिल गए।

(2) संयुक्त वाक्य- छुट्टी की घंटी बजी और सब छात्र भाग गए।
मिश्र वाक्य- जब छुट्टी की घंटी बजी, तब सब छात्र भाग गए।

मिश्र वाक्य से संयुक्त वाक्य में परिवर्तन

(1) मिश्र वाक्य- वह उस स्कूल में पढ़ा जो उसके गाँव के निकट था।
संयुक्त वाक्य- वह स्कूल में पढ़ा और वह स्कूल उसके गाँव के निकट था।

(2) मिश्र वाक्य- मुझे वह पुस्तक मिल गई है जो खो गई थी।
संयुक्त वाक्य- वह पुस्तक खो गई थी परन्तु मुझे मिल गई है।

कर्तृवाचक से कर्मवाचक वाक्य में परिवर्तन

(1) कर्तृवाचक वाक्य- लड़का रोटी खाता है।
कर्मवाचक वाक्य- लड़के से रोटी खाई जाती है।

(2) कर्तृवाचक वाक्य- तुम व्याकरण पढ़ाते हो।
कर्मवाचक वाक्य- तुमसे व्याकरण पढ़ाया जाता है।

अर्थ की दृष्टि से वाक्य में परिवर्तन

विधिवाचक से निषेधवाचक वाक्य में परिवर्तन

(1) विधिवाचक वाक्य- वह मुझसे बड़ा है।
निषेधवाचक- मैं उससे बड़ा नहीं हूँ।

विधानवाचक वाक्य से निषेधवाचक वाक्य में परिवर्तन

(1) विधानवाचक वाक्य- यह प्रस्ताव सभी को मान्य है।
निषेधवाचक- इस प्रस्ताव के विरोधाभास में कोई नहीं है।

निश्चयवाचक वाक्य से प्रश्नवाचक वाक्य में परिवर्तन

(1) निश्चयवाचक- आपका भाई यहाँ नहीं हैं।
प्रश्नवाचक- आपका भाई कहाँ है ?

(2) निश्चयवाचक- किसी पर भरोसा नहीं किया जा सकता है।
प्रश्नवाचक- किस पर भरोसा किया जाए ?

विस्मयादिबोधक वाक्य से विधानवाचक वाक्य में परिवर्तन

(1) विस्मयादिबोधक- वाह! कितना बड़ा नगर है!
विधानवाचक वाक्य- बहुत ही बड़ा नगर है!

(2) विस्मयादिबोधक- काश! मैं बालक होता।
विधानवाचक वाक्य- मैं चाहता हूँ कि मैं बालक होता।

वाक्य रचना के नियम

‘व्याकरण-सिद्ध पदों को मेल के अनुसार यथाक्रम रखने को ही ‘वाक्य-रचना’ कहते है।’ वाक्य का एक पद दूसरे से लिंग, वचन, पुरुष, काल आदि का जो संबंध रखता है, उसे ही ‘मेल’ कहते हैं। जब वाक्य में दो पद एक ही लिंग-वचन-पुरुष-काल और नियम के हों तब वे आपस में मेल, समानता या सादृश्य रखनेवाले कहे जाते हैं। शुद्ध वाक्यों की रचना के लिए (क) क्रम (ख) अन्वय और (ग) प्रयोग से सम्बद्ध कुछ सामान्य नियमों का ज्ञान आवश्यक है।

(क) क्रम

किसी वाक्य के सार्थक शब्दों को यथास्थान रखने की क्रिया को ‘क्रम’ अथवा ‘पद क्रम’ कहते हैं। इसके नियम इस प्रकार हैं-

(i) वाक्य के आरम्भ में कर्ता, मध्य में कर्म और अन्त में क्रिया होनी चाहिए। जैसे- राम ने भोजन किया। यहाँ कर्ता ‘राम’, कर्म ‘भोजन’ और अन्त में क्रिया ‘क्रिया’ है।

(ii) उद्देश्य या कर्ता के विस्तार को कर्ता के पहले और विधेय या क्रिया के विस्तार को विधेय के पहले रखना चाहिए। जैसे- अच्छे विद्यार्थी धीरे-धीरे पढ़ते हैं।

(iii) कर्ता और कर्म के बीच अधिकरण, अपादान, सम्प्रदान और करण कारक क्रमशः आते हैं। जैसे- राम ने घर में (अधिकरण) आलमारी से (अपादान) मोहन के लिए (सम्प्रदान) हाथ से (करण) किताब निकाली।

(iv) सम्बोधन आरम्भ में आता है। जैसे हे प्रभु, मुझ पर कृपा करें।

(v) विशेषण विशेष्य या संज्ञा के पहले आता है। जैसे- मेरी काली कमीज कहीं खो गयी।

(vi) क्रियाविशेषण क्रिया के पहले आता है। जैसे- वह तेज दौड़ता है।

(vii) प्रश्रवाचक पद या शब्द उसी संज्ञा के पहले रखा जाता है, जिसके बारे में कुछ पूछा जाय। जैसे- क्या राम सो रहा है ?

क्रम-संबंधी कुछ अन्य बातें

(1) प्रश्नवाचक शब्द को उसी के पहले रखना चाहिए, जिसके विषय में मुख्यतः प्रश्न किया जाता है। जैसे- वह कौन व्यक्ति है ?

(2) यदि पूरा वाक्य ही प्रश्नवाचक हो तो ऐसे शब्द (प्रश्नसूचक) वाक्यारंभ में रखना चाहिए। जैसे- क्या आपको यही बनना था ?

(3) यदि ‘न’ का प्रयोग आदर के लिए आए तो प्रश्नवाचक का चिह्न नहीं आएगा और ‘न’ का प्रयोग अंत में होगा। जैसे- आप मेरे यहाँ पधारिए न।

(4) यदि ‘न’ क्या का अर्थ व्यक्त करे तो अंत में प्रश्नवाचक चिह्न का प्रयोग करना चाहिए और ‘न’ वाक्यान्त में होगा। जैसे- वह आज-कल स्वस्थ है न ?

(5) पूर्वकालिक क्रिया मुख्य क्रिया के पहले आती है। जैसे- वह खाकर विद्यालय जाता है।

(6) विस्मयादिबोधक शब्द प्रायः वाक्यारंभ में आता है।
जैसे- वाह ! आपने भी खूब कहा है।

(ख) अन्वय

‘अन्वय’ में लिंग, वचन, पुरुष और काल के अनुसार वाक्य के विभित्र पदों (शब्दों) का एक-दूसरे से सम्बन्ध या मेल दिखाया जाता है। यह मेल कर्ता और क्रिया का, कर्म और क्रिया का तथा संज्ञा और सर्वनाम का होता हैं।

कर्ता और क्रिया का मेल

(i) यदि कर्तृवाचक वाक्य में कर्ता विभक्तिरहित है, तो उसकी क्रिया के लिंग, वचन और पुरुष कर्ता के लिंग, वचन और पुरुष के अनुसार होंगे। जैसे- करीम किताब पढ़ता है।

(ii) यदि वाक्य में एक ही लिंग, वचन और पुरुष के अनेक विभक्तिरहित कर्ता हों और अन्तिम कर्ता के पहले ‘और’ संयोजक आया हो, तो इन कर्ताओं की क्रिया उसी लिंग के बहुवचन में होगी। जैसे- मोहन और सोहन सोते हैं।
आशा, उषा और पूर्णिमा स्कूल जाती हैं।

(iii) यदि वाक्य में दो भित्र लिंगों के कर्ता हों और दोनों द्वन्द्व समास के अनुसार प्रयुक्त हों तो उनकी क्रिया पुंलिंग बहुवचन में होगी। जैसे- नर-नारी गये।

(iv) यदि वाक्य में दो भित्र-भित्र विभक्तिरहित एकवचन कर्ता हों और दोनों के बीच ‘और’ संयोजक आये, तो उनकी क्रिया पुंलिंग और बहुवचन में होगी. जैसे- राधा और कृष्ण रास रचते हैं। बाघ और बकरी एक घाट पानी पीते हैं।

(v) यदि वाक्य में दोनों लिंगों और वचनों के अनेक कर्ता हों, तो क्रिया बहुवचन में होगी और उनका लिंग अन्तिम कर्ता के अनुसार होगा। जैसे- एक लड़का, दो बूढ़े और तीन लड़कियाँ आती हैं।

(vi) यदि वाक्य में अनेक कर्ताओं के बीच विभाजक समुच्चयबोधक अव्यय ‘या’ अथवा ‘वा’ रहे तो क्रिया अन्तिम कर्ता के लिंग और वचन के अनुसार होगी।
जैसे- घनश्याम की पाँच दरियाँ व एक कम्बल बिकेगा। हरि का एक कम्बल या पाँच दरियाँ बिकेंगी। मोहन का बैल या सोहन की गायें बिकेंगी।

(vii) यदि उत्तमपुरुष, मध्यमपुरुष और अन्यपुरुष एक वाक्य में कर्ता बनकर आयें तो क्रिया उत्तम पुरुष के अनुसार होगी। जैसे- वह और हम जायेंगे।

कर्म और क्रिया का मेल

(i) यदि वाक्य में कर्ता ‘ने’ विभक्ति से युक्त हो और कर्म की ‘को’ विभक्ति न हो, तो उसकी क्रिया कर्म के लिंग, वचन और पुरुष के अनुसार होगी।
जैसे- मोहन ने पुस्तक पढ़ी।

(ii) यदि कर्ता और कर्म दोनों विभक्ति चिह्नों से युक्त हों, तो क्रिया सदा एकवचन पुल्लिंग और अन्यपुरुष में होगी। जैसे- मैंने कृष्ण को बुलाया।

(iii) यदि कर्ता ‘को’ प्रत्यय से युक्त हो और कर्म के स्थान पर कोई क्रियार्थक संज्ञा आए तो क्रिया सदा पुंलिंग, एकवचन और अन्यपुरुष में होगी। जैसे- तुम्हें (तुमको) पुस्तक पढ़ना नहीं आता।

(iv) यदि एक ही लिंग-वचन के अनेक प्राणिवाचक विभक्तिरहित कर्म एक साथ आएँ, तो क्रिया उसी लिंग में बहुवचन में होगी। जैसे- श्याम ने बैल और घोड़ा मोल लिए।

(v) यदि एक ही लिंग-वचन के अनेक प्राणिवाचक-अप्राणिवाचक अप्रत्यय कर्म एक साथ एकवचन में आयें, तो क्रिया भी एकवचन में होगी। जैसे- मैंने एक गाय और एक भैंस खरीदी।

(vi) यदि वाक्य में भित्र-भित्र लिंग के अनेक प्रत्यय कर्म आयें और वे ‘और’ से जुड़े हों, तो क्रिया अन्तिम कर्म के लिंग और वचन में होगी। जैसे- मैंने मिठाई और पापड़ खाये।

लेखक- डॉ अरुण कुमार, असिस्टेंट प्रोफ़ेसर, लक्ष्मीबाई महाविद्यालय, दिल्ली विश्वविद्यालय व सम्पादक, लोकमंच पत्रिका, सम्पर्क – 8178055172, 09868719955, lokmanchpatrika@gmail.com

6 thoughts on “वाक्य विचार: परिभाषा, भेद और उदाहरण- अरुण कुमार

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