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अध्यापक पूर्ण सिंह का निबन्ध : सच्ची वीरता – अरुण कुमार

सरदार पूर्ण सिंह एक प्रसिद्ध देशभक्त, अध्यापक, वैज्ञानिक एवं लेखक थे। वे पंजाबी भाषा के कवि भी थे। आधुनिक पंजाबी कविता के इतिहास में पूर्ण सिंह का नाम बड़े आदर के साथ लिया जाता है। उनका जन्म सन 1881 ई में एबटाबाद जिले में हुआ था जो अब पाकिस्तान में है। उनकी प्रारम्भिक शिक्षा रावलपिंडी में हुई। उच्च शिक्षा प्राप्त करने के लिए वे जापान चले गए। वहां तीन वर्ष तक इम्पीरियल यूनिवर्सिटी में रसायन शास्त्र का अध्ययन किया। जापान में ही स्वामी रामतीर्थ से उनकी मुलाकात हुई। रामतीर्थ के विचारों का उन पर इतना अधिक प्रभाव पड़ा कि उन्होंने संन्यास ले लिया. वे जापान से स्वामी रामतीर्थ के साथ ही भारत लौट आए। स्वामी जी की मृत्यु के बाद उन्होंने सन्यास जीवन का त्याग कर दिया और विवाह कर गृहस्थ जीवन बिताने लगे। इसके बाद देहरादून के फॉरेस्ट कॉलेज में अध्यापक की नौकरी शुरू की लेकिन यहां भी वे बहुत दिनों तक टिक नहीं पाए। अध्यापक पूर्ण सिंह का 1931 ई में निधन हो गया। 

साहित्य जगत में प्रोफेसर पूर्ण सिंह को अध्यापक पूर्ण सिंह के नाम से जाना जाता है। आचार्य रामचन्द्र शुक्ल ने अपने ‘हिन्दी साहित्य का इतिहास’ में अध्यापक पूर्ण सिंह के तीन निबंधों का उल्लेख किया है- मजदूरी और प्रेम, सच्ची वीरता और ‘आचरण की सभ्यता‘ । इसके अतिरिक्त ‘कन्यादान‘, ‘पवित्रता’ और ‘अमेरिका का मस्त जोगी- वाल्ट व्हिटमैन‘ उनके प्रसिद्द निबंध हैं. ये निबंध साहित्य जगत में खूब लोकप्रिय हुए। उनके अधिकांश निबन्ध 1909 से 1912 ई के बीच प्रकाशित हुए हैं। इन्हीं निबंधों के आधार पर उनकी गिनती हिन्दी के श्रेष्ठ निबंधकारों में होती है। इसी समय अर्थात बीसवीं सदी के आरंभिक वर्षों में हिन्दी तथा अन्य भारतीय भाषाओं में साहित्य की नवीन विधाएं पश्चिमी साहित्य की प्रेरणा और प्रभाव से विकसित हो रही थीं। निबन्ध भी एक ऐसी ही विधा थी। हिन्दी में निबन्ध शब्द का प्रयोग अंग्रेज़ी के Essay शब्द के समानार्थी शब्द के रूप में होता है। जब हिन्दी साहित्य में निबन्ध अपना स्वरूप ग्रहण कर रहा था तभी अध्यापक पूर्ण सिंह ने अपनी नई शैली, नए विषय और नए रंग लेकर आए. उनके निबंधों से हिन्दी निबन्ध साहित्य समृद्ध हुआ।

सरदार पूर्ण सिंह, लोकमंच पत्रिका
सरदार पूर्ण सिंह, लोकमंच पत्रिका

अध्यापक पूर्ण सिंह की चर्चा एक श्रेष्ठ आत्मव्यंजक निबन्धकार के रूप में की जाती है। वे द्विवेदी युग के लेखक थे परन्तु द्विवेदी युग  की उपदेशात्मकता उनके निबंधों में नहीं है। उनके निबंधों में विचारों की प्रगतिशीलता है जो आगे चलकर महात्मा गांधी के विचारों में दिखाई देता है। अपने निबंधों में उन्होंने गांधी जी से पहले ही चरखा के महत्व को स्वीकार किया था और छोटे-छोटे उद्योगों के निर्माण का समर्थन किया था। उनके निबंधों में व्यक्त विचार उनके समय से काफी आगे हैं। अध्यात्म और विज्ञान उनके निबंधों की प्रमुख विशेषता है। निबन्ध रचना के लिए उन्होंने प्रमुख रूप से नैतिक विषयों को चुना है। पूर्ण सिंह के निबन्ध मुख्यतः भावात्मक कोटि में आते हैं जिनमें विचारों के सूत्र भी भरे-पड़े हैं। 

‘सच्ची वीरता’ अध्यापक पूर्ण सिंह द्वारा लिखित एक विचारात्मक निबन्ध है। इस निबन्ध के माध्यम से उन्होंने बताया है कि सच्ची वीरता क्या है ? उन्होंने अपने निबन्ध में कई उदाहरण देकर सच्चे वीर पुरुषों के बारे में बताया है। उन्होंने लिखा है कि सच्चे वीर धीर, गंभीर और स्वतंत्र होते हैं। अध्यापक पूर्ण सिंह ने अपने इस निबन्ध में यह भी बताया है कि वीरता कई प्रकार की होती है। मनुष्य के अन्दर वीरता का विकास कई प्रकार से होता है | मनुष्य के अन्दर वीरता का विकास कभी युद्ध भूमि में, कभी तलवार-तोप के आगे जान गँवाने में होता है. कभी साहित्य और संगीत में वीरता खिलती है | कभी जीवन के गूढ़ तत्व और सत्य की तलाश में बुद्ध जैसे राजा वीर हो जाते हैं | कभी किसी आदर्श पर और कभी किसी पर वीरता अपना झंडा लहराती है| वीरता हमेशा निराली और नई होती है | कुछ वीर युद्ध में वीरता दिखाते हैं तो कुछ सत्य की खोज में भगवान गौतम बुद्ध की तरह विरक्त होकर भी वीर हो जाते हैं। पूर्ण सिंह का स्पष्ट मानना है कि वीरता जितना देह का गुण नहीं उतना मन का गुण है.

पूर्ण सिंह अपने निबन्ध में वीर नायकों के रूप में मंसूर, पैगंबर मुहम्मद, गुरु नानक, भगवान शंकर, मीरा, नेपोलियन, शम्स तबरेज़ और ईसा आदि का नाम लेते हैं. वे जितने भी उदाहरण देते हैं, वे सभी दूसरे पर आक्रमण का या दूसरों को हानि पहुंचाने का नहीं हैं. ये सभी स्वयं की जान को जोखिम में डालने के कारण वीर कहलाते हैं. वे बताते हैं कि एक बार एक राजा मृग का शिकार कर रहा था | भगवान बुद्ध ने उस मृग को बचाने के लिए स्वयं को तीर के सामने कर दिया. इस प्रकार भगवान बुद्ध ने त्याग का उदाहरण प्रस्तुत किया | भगवान शंकर से एक कापालिक उनका सिर मांगता है. अब शंकर ठहरे औघड़दानी ! सिर उतार उसे खुशी-खुशी दे देते हैं. मंसूर ईश्वर के प्रेम में इस तरह लीन थे कि उन्हें लगता था कि अब वे और ईश्वर एक हो चुके हैं | वे स्वयं को ‘अनहलक’ अर्थात ‘मैं ईश्वर हूँ’ कहते थे | मंसूर की यह बात बग़दाद के राजा को पसंद नहीं आयी | उसने मंसूर को पत्थर मारकर मार डालने की सजा सुनाई | बग़दाद के लोगों ने उन्हें पत्थर मारकर मार डाला पर वे अपने अंतिम समय में भी यही बोलते रहे कि “मैं खुदा हूँ” |

पूर्ण सिंह ने गुरु नानक के जीवन की एक घटना का उदाहरण दिया है. एक बार गुरु नानक को गिरफ्तार कर जब बाबर के सिपाही उनके सिर पर बोझा रख उसे ढोने को कहते हैं तो वे चल पड़ते हैं, लेकिन बोझा ढोते हुए भी अपने साथी मर्दाना से कहते हैं, ‘सारंगी बजाओ!’ वह सारंगी बजाता है और नानक गाते हैं. महाराजा रणजीत सिंह को पेशावर पर आक्रमण करना था पर रास्ते में अटक नदी पड़ती थी. अटक नदी में उस समय बहुत पानी था.  ऐसी स्थिति में नदी पार करने का उत्साह सेना में नहीं था. रणजीत सिंह ने अपना घोड़ा नदी में उतार दिया और ऐसा कहा जाता है कि अटक सूख गयी तथा पूरी सेना ने अटक पार कर लिया. इस प्रकार महाराजा रणजीत सिंह ने अद्भुत साहस तथा वीरता का परिचय दिया. नेपोलियन एल्प्स पर्वत को पार कर शत्रु सेना पर आक्रमण करना चाहता था. उसकी सेना को एल्प्स पर्वत पर चढ़ना असंभव लग रहा था. नेपोलियन ने कहा कि “एल्प्स कहीं है ही नहीं” और तुरंत पर्वत पर चढ़ गया | इससे उसकी सेना का आत्मविश्वास बढ़ गया और पूरी सेना ने पर्वत पार कर लिया |

अध्यापक पूर्ण सिंह ने ईसा मसीह के जीवन के बारे में भी बताया है. वे लिखते हैं कि ईसा मसीह को अपने समय के राजा के आदेश पर भारी कष्ट दिया गया. उनको सलीब पर टाँग दिया गया था. कोई पत्थर मारता, कोई ढेला मारता, कोई थूकता किंतु ईसा का दिल नहीं दहला. वह चाहते तो एक निगाह से उस राजा का तख्ता पलट सकते थे. उन मुसीबतों को उन्होंने मजाक समझा, ईश्वर का उपहार समझा. इसमें उनकी महानता प्रकट होती है. मीरा को मारने के लिए राजा ने उसे विष का प्याला पिलाया. उस विष को मीरा ने अमृत मानकर पी लिया. उसे कुछ नहीं हुआ. मीरा को राजा ने शेर तथा हाथी के सामने डाल दिया पर दोनों ने मीरा के पैरों की धूल को अपने मस्तक पर मला और अपने रास्ते चले गए |

पूर्ण सिंह लिखते हैं ‘वह वीर क्या जो टीन के बर्तन की तरह झट गरम और झट ठंडा हो जाता है. सदियों नीचे आग जलती रहे तो भी शायद ही वीर गरम हो और हज़ारों वर्ष बर्फ उस पर जमी रहे तो भी क्या मजाल जो उसकी वाणी तक ठंडी हो. उसे ख़ुद गर्म और सर्द होने से क्या मतलब? वे अंग्रेज लेखक कारलायल का उदाहरण देते हुए लिखते हैं कि कारलायल को जो आज की सभ्यता पर गुस्सा आया तो दुनिया में एक नई शक्ति और एक नई जवानी पैदा हुई. कारलायल अंग्रेज़ ज़रूर है, पर उसकी बोली सबसे निराली है. उसके शब्द मानो आग की चिंगारियां है, जो आदमी के दिलों में आग सी जला देते हैं. अब कुछ बदल जाए, मगर कारलायल की गर्मी कभी कम न होगी. यदि हज़ार वर्ष दुनिया में दुखड़े और दर्द रोएं जाएं तो भी बुद्ध की शांति और दिल की ठंडक एक दर्ज़ा भी इधर-उधर न होगी. यहां आकर भौतिक विज्ञान के नियम रो देते हैं. हज़ारों वर्ष आग जलती रहे तो भी थर्मामीटर जैसा का तैसा.’

यदि हम अपने प्राचीन ग्रंथों को दुबारा पढ़ें तो वीर के उदाहरण के रूप में वे नहीं आते, जिनकी हम मंदिर बनाकर आराधना करते हैं, बल्कि वे हैं जो इन आराध्यों के द्वारा मारे गए हैं. महाभारत का कर्ण याद आता है. सूर्य का अंश था उसमें, ज्ञानी था, उसे मालूम था कि विजय आखिरकार पांडवों की होगी लेकिन अपनी माता कुंती के समझाने पर भी पक्ष नहीं बदला. उसे जाति का दंड भी भोगना पड़ा. गुरु ने ज्ञान और जाति के बीच के संबंध की मर्यादा की रक्षा के लिए शाप दे दिया. गुरु ने शाप दिया कि जो सिखाया है, जब उसकी आवश्यकता होगी, उसी समय उसे भूल जाओगे. कर्ण को पता था कि जो ब्राह्मण उससे कवच और कुंडल मांग रहा है, वह उसे मृत्यु के सामने भेज रहा है. लेकिन कर्ण ने अपने जीवन की जगह अपने मूल धर्म का पालन करना उचित समझा. वे लिखते हैं कि यह आश्चर्य की बात है कि हम वीर अर्जुन को कहते हैं, कर्ण को नहीं! अर्जुन को वीर सिद्ध करने के लिए एकलव्य के साथ-साथ अनेक वीरों को छलपूर्वक हटाया गया. कर्ण और एकलव्य भी सच्चे वीरों की श्रेणी में आते हैं. हम सफलता की पूजा करते हैं इसलिए अर्जुन को वीर मानते हैं यदि हम वीरता की पूजा करेंगे तो कर्ण और एकलव्य भी वीर माने जायेंगे.

अध्यापक पूर्ण सिंह लिखते हैं कि “वीरों के बनाने के कारखाने नहीं होते |” अर्थात किसी व्यक्ति को वीर बनाया नहीं जा सकता | वह तो काल की अनिवार्य उत्पत्ति के रूप में आ जाता है और उसे होने का कोई निश्चित स्थान भी नहीं होता। जब यूरोप में पोप का अत्याचार बहुत अधिक बढ़ गया तो मार्टिन लूथर किंग ने उसका विरोध किया। पोप का विरोध करना अपनी जान को खतरे में डालना था लेकिन जब वीरता जोर मारती है तो व्यक्ति जान की परवाह नहीं करता है। मार्टिन लूथर किंग ने पोप के विरोध में आवाज़ उठाई जो उनकी आत्मा की आवाज थी। मार्टिन लूथर किंग की आवाज के सामने पोप का मजबूत साम्राज्य ध्वस्त हो गया।

पूर्ण सिंह लिखते हैं कि वीरता का गुण मनुष्य में स्वतः विकसित होता है | उन्होंने इसके लिए देवदार के पेड़ का उदाहरण दिया है | जिस तरह देवदार के पेड़ अपने आप उगते हैं उसी उसी तरह वीर अपने आप पैदा होते हैं | वीरता का गुण बाहरी वातावरण पर निर्भर नहीं होता यह मनुष्य के अंतर्मन से प्रकट होता है | वीरता का संबंध स्वयं को जानने से है. वीर का नाम जपने से वीरता नहीं आती. वीरों के चित्र रोज़ देखने से भी वीर नहीं बना जा सकता है. अध्यापक पूर्ण सिंह सच्ची वीरता को एक प्रकार की अंतः प्रेरणा मानते हैं। उन्होंने माना है कि सच्ची वीरता किसी मनुष्य के अंतर्मन में उत्पन्न होती है। उस वीरता को देखकर लोग अचंभित हो जाते हैं। यह आवश्यक नहीं है कि जो युद्ध भूमि में शत्रुओं पर विजय प्राप्त कर ले वही वीर है बल्कि सभी प्राणियों को अपने समान समझने वाला भी वीर ही कहलाता है। वीर पुरुष सबके साथ एकीकृत हृदय वाला और सबका होता है। सच्चा वीर कभी भी अपने-पराए में भेद नहीं करता है। वह देवदार के पेड़ की तरह हमेशा दूसरों को छाया देने के लिए खड़ा रहता है। उसका जीवन ही परोपकार को समर्पित होता है.

पूर्ण सिंह कहते हैं कि ‘जब कभी हम वीरों का नाम सुनते हैं तब हमारे अंदर भी वीरता की लहरें उठती हैं और वीरता का रंग चढ़ जाता है. परंतु वह अधिक समय तक नहीं टिकता है. हमें टीन के बर्तन का स्वभाव छोड़कर अपने जीवन के केंद्र में निवास करना होगा और सच्चाई की चट्टान पर दृढ़ता से खड़ा होना होगा. अपना जीवन दूसरे के हवाले करना होगा ताकि जीवन को बचाने की कोशिशों में समय बर्बाद न हो. वे आगे लिखते हैं द्वेष और भेद दृष्टि छोड़ो, रोना छूट जाएगा. प्रेम और आनंद से काम लो, शांति की वर्षा होने लगेगी और दुखड़े दूर हो जाएंगे. जीवन के तत्व का अनुभव करके चुप हो जाओ, धीर और गंभीर हो जाओगे. वीरों की, फ़क़ीरों की, पीरों की यह कूक है – हटो पीछे, अपने अंदर जाओ, अपने आप को देखो, दुनिया और की और हो जाएगी.’

वीर पुरुष लोगों के दिलों पर राज्य करता है | उसका दिल सबका दिल हो जाता है | उसका मन सबका मन हो जाता है | उसके ख्याल सबके ख्याल हो जाते हैं | सबके संकल्प उसके संकल्प हो जाते हैं | उसका बल सबका बल हो जाता है | वह सबका और सब उसके हो जाते हैं |सहज परिस्थितियों में सफलता प्राप्त करने से मनुष्य की वीरता का पता नहीं चलता | विपरीत परिस्थितियों के दौरान ही वीर की पहचान होती है | वीर मनुष्य ऐसी परिस्थितियों को एक चुनौती के तौर पर लेते हैं | इन चुनौतियों को सहजता से पार कर वे स्वयं को साबित करते हैं | विपरीत परिस्थितियों का वीरों पर कोई प्रभाव नहीं पड़ता | उनके लिए सब परिस्थितियाँ समान हैं |

स्वयं को वीर साबित करने के लिए युद्ध के मैदान में जाना जरूरी नहीं है | प्रत्येक व्यक्ति को युद्ध में भाग लेने का मौका भी नहीं मिलता | हम अपने सामान्य जीवन में भी स्वयं को वीर साबित कर सकते हैं | जीवन में अनेक प्रकार की कठिनाइयाँ आती रहती है | विपरीत स्वभाव वाले लोगों से सामना होता रहता है | दुःख और कष्ट आते रहते हैं | ऐसी स्थिति में मनुष्य किस तरह इन सबका सामना करता है, इससे उसकी वीरता प्रकट होती है | यदि मनुष्य ऐसी विपरीत परिस्थितियों से प्रभावित न हो, दुखों-कष्टों से डरे नहीं, कोई व्यक्ति उसके मन में भय न उत्पन्न कर सके तो ऐसा मनुष्य वास्तव में वीर है |

सतोगुण से तात्पर्य है निर्मल तथा शुद्ध मन, जिसमें किसी के अहित, किसी की निंदा, किसी के अपमान, किसी से ईर्ष्या के लिए कोई स्थान न हो | ऐसे गुण वाला व्यक्ति कभी भी बाहरी परिवेश से प्रभावित नहीं होता | वह हमेशा सब के हित में लगा होता है | उसके लिए हानि-लाभ, जीवन-मरण, मान-अपमान, यश-अपयश सब समान होता है | वह कभी गलत राह पर नहीं चलता | कितना बड़ा संकट भी आए, वह हमेशा सत्य के मार्ग पर दृढ़ रहता है | ऐसे व्यक्ति मनुष्य के भेष में देवता होते हैं |

अपने निबन्ध सच्ची वीरता’ में अध्यापक पूर्ण सिंह ने वीरता के कार्य की तुलना में आत्मा की वीरता को अधिक महत्व दिया है। उन्होंने आत्मा की वीरता को ही सच्ची वीरता माना है। वे लिखते हैं कि ‘अपने आपको हर घड़ी और हर पल महान से भी महान बनाने का नाम वीरता है। वीरता के कारनामे तो एक गौण बात है।’ वे स्पष्ट कहते हैं कि मनुष्य की वीरता के अनेक रूप हैं उसमें युद्ध क्षेत्र की वीरता केवल एक रूप है। वे लिखते हैं कि सच्चा वीर केवल वही नहीं है जो युद्ध भूमि में शत्रुओं पर विजय प्राप्त करता है. सच्ची वीरता तो दूसरे मनुष्यों की भलाई के लिए किया जाने वाला कार्य भी है। वे बताते हैं कि भारतीय पुराणों में भगवान विष्णु के अवतारों की जो कल्पना की गई है वे भी सच्ची वीरता के बहुत अच्छे उदाहरण हैं। वे वीरता की विशेषता बताते हुए कहते हैं कि सच्ची वीरता में मौलिकता और नयापन होती है। वह अनुकरण की वस्तु नहीं है और वह उधार लेने की वस्तु भी नहीं है। वीरता कभी हमारे सामने सख्त रूप में तो कभी कोमल रूप में प्रस्तुत होती है। अध्यापक पूर्ण सिंह जापान के निवासियों का उदाहरण देते हुए कहते हैं कि वहां के निवासी वीरता के कोमल रूप की पूजा करते हैं। चेरी के कोमल फूल में वे वीरता के दर्शन करते हैं। वास्तव में कोमलता की वीरता और भी अधिक उच्च कोटि की वीरता होती है। 

अपने निबंध सच्ची वीरता में अध्यापक पूर्ण सिंह आगे लिखते हैं कि सच्चे वीर के दिल की आवाज केवल उसके दिल की आवाज़ नहीं होती बल्कि वह मानवमात्र के दिल की आवाज़ बन जाती है। उसका व्यक्ति भाव पूरे संसार का भाव बन जाता है अर्थात वह व्यक्तिगत स्वार्थ से ऊपर उठ जाता है। वह सभी प्राणियों के कल्याण की कामना करता है। सच्चे वीरों की आवाज़ की बुलंदी कभी मंद नहीं पड़ती है। पूर्ण सिंह ने कारलायल का उदाहरण देते हुए समझाया है कि सब कुछ बदला जा सकता है परन्तु कारलायल की लेखनी की उष्णता कभी कम नहीं हो सकती। वीर के स्वर में कटुता नहीं आ सकती. जैसे कटुता नहीं, वैसे ही किसी के प्रति घृणा भी नहीं. उसे उत्तेजित करना असंभवप्राय है. अपना निर्णय वह स्वयं लेता है, किसी के कहने या आदेश से तो कतई नहीं. धीरता और गांभीर्य उसके स्वभाव के अंग हैं:

सच्चे वीर अपने ह्रदय और मस्तिष्क से भी स्वतंत्र होते हैं. पूर्ण सिंह ने लिखा है कि सच्चा वीर आज़ाद होता है। उसकी सबसे बड़ी खूबी होती है कि वह किसी की भी अधीनता स्वीकार नहीं करता है। वे एक उदाहरण के माध्यम से अपनी बात की पुष्टि करते हैं – ‘एक बागी ग़ुलाम और एक बादशाह की बातचीत हुई. यह ग़ुलाम क़ैदी दिल से आज़ाद था. बादशाह ने कहा – मैं तुमको अभी जान से मार डालूंगा. तुम क्या कर सकते हो? ग़ुलाम बोला – हां, मैं फांसी पर तो चढ़ जाऊंगा, पर तुम्हारा तिरस्कार तब भी कर सकता हूं.’ उस ग़ुलाम ने दुनिया के बादशाहों के बल और अपनी वीरता की हद दिखला दी. अत्याचारी राजा आम जनता के शरीर को दुःख देते हैं और मारपीट कर लोगों को डराते हैं. निर्बल लोग उनसे डरते हैं क्योंकि वे शरीर को अपने जीवन का केंद्र समझते हैं. इस कारण जहां किसी ने भी उनके शरीर को कष्ट पहुंचाई वे डर जाते हैं.’ अध्यापक पूर्ण सिंह लिखते हैं कि वीरता देह से अधिक मस्तिष्क में है

अध्यापक पूर्ण सिंह कहते हैं कि सच्चा वीर उच्च कोटि का गंभीर व्यक्ति भी होता है और चंचल भी। सच्ची वीरता का एक उदाहरण उन्होंने बताया है कि एक बार अकबर के दरबार में दो वीर आए। उन दोनों ने स्वयं को दूसरे से बड़ा वीर सिद्ध करते हुए कई बातें कहीं। जब अकबर ने दोनों से उनकी सच्ची वीरता का सबूत मांगा तो तो दोनों ने एक दूसरे पर तलवार से आक्रमण कर दिया और दोनों मारे गए। इस आधार पर पूर्ण सिंह यह कहना चाहते हैं कि सच्चा वीर बुद्धिमान भी होता है. केवल शारीरिक वीरता किसी भी काम की नहीं होती है.

सच्ची वीरता’ निबंध की शैलीगत विशेषताएं –

अध्यापक पूर्ण सिंह ने भावात्मक निबन्ध लिखे हैं। इसी कारण उनके निबंधों में भावात्मक शैली की प्रमुखता है। उनके निबन्धों में काव्यात्मकता का भी गुण है और वे भाव-विभोर होकर अपनी बात लिखते हैं। उनके निबंधों में व्यक्त विचार भी भावों में लिपटे हुए हैं। अध्यापक पूर्ण सिंह के निबंधों की एक अन्य विशेषता उनकी लाक्षणिकता है। उनकी भाषा जैसी लाक्षणिकता अन्यत्र नहीं मिलती है। इस प्रकार की शैली के कारण उनके निबंधों में सहजता, रोचकता, अर्थगत विलक्षणता के गुण आ गए हैं। उनके निबंधों की तीसरी विशेषता चित्रात्मकता है। वे जो भी लिखते हैं पाठक के सामने उसका चित्र उपस्थित हो जाता है। यह शैली उनके सभी निबन्धों में दिखाई देती है। उनके प्रसिद्ध निबन्ध ‘आचरण की सभ्यता’ का एक उदाहरण है- तारागणों को देखते-देखते भारतवर्ष अब समुद्र में गिरा कि गिरा, एक कदम और धड़ाम से नीचे। उनके निबंधों में हास्य और व्यंग्य शैली के भी दर्शन होते है। धार्मिक अंधविश्वासों को अभिव्यक्त करने के लिए उन्होंने हास्य और व्यंग्य शैली का खूब प्रयोग किया है। उन्होंने कभी-कभी गंभीर विषय को भी हास्य- व्यंग्य के द्वारा सरलता से अभिव्यक्त कर दिया है। हास्य-व्यंग्य शैली का यह उदाहरण देखने योग्य है- परन्तु अंग्रेज़ी भाषा का व्याख्यान चाहे वह कारलायल का लिखा हुआ क्यों न हो – बनारस के पंडितों के लिए रामलीला ही है।

अध्यापक पूर्ण सिंह की मातृभाषा पंजाबी थी लेकिन राष्ट्रभाषा हिन्दी से उन्हें विशेष स्नेह था। अतः उन्होंने हिन्दी में उच्च कोटि के निबन्धों की रचना की है। अध्यापक पूर्ण सिंह के निबंधों की भाषा में संस्कृत की तत्सम शब्दावली का खूब प्रयोग हुआ है। इस प्रकार की भाषा का प्रयोग भाषा को प्रवाहमान और अर्थपूर्ण बनाने के लिए किया गया है। उनके निबंधों में उर्दू के प्रचलित शब्दों का भी खूब प्रयोग हुआ है। ये शब्द उनकी भाषा के सहज अंग बनकर आए है। इनके प्रयोग से भाषा में एक प्रकार की सहजता का संचार हुआ है। पूर्ण सिंह जिस समय निबन्ध लेखन कर रहे थे उस समय उर्दू-फ़ारसी के शब्दों का खूब प्रयोग होता था। इस कारण भी पूर्ण सिंह के निबंधों में उर्दू के शब्दों का प्रयोग हुआ है।

लेखक- डॉ अरुण कुमार, असिस्टेंट प्रोफ़ेसर, लक्ष्मीबाई महाविद्यालय व सम्पादक, लोकमंच पत्रिका ( lokmanch.in ) सम्पर्क – 08178055172, 9868719955, lokmanchpatrika@gmail.com

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