लोकमंच पत्रिका

लोकचेतना को समर्पित
कविता चतुर्वेदी की ‘पत्थर की पूजा’ व अन्य कविताएं

1. पत्थर की पूजा

एक रोज मैं गुजरी मोड़ से उसके

जब देखा उस औरत की श्रद्धा को,

दंग हो कर मैं, गई उसके करीब जो

एक पत्थर को यूंँ पूज रही थी,

जैसे कोई मूरत हो सामने उसके।

मन में मेरे कई सवाल उमड़े

एक ललक बनकर वे यूँ घुमड़े,

थोड़ी विचलित होकर मैं पूछ पड़ी

पत्थर है यह केवल क्यों पूजती हो इसे ?

तुम्हें ऐसा क्या नजर आता है इसमें ?

उसने पलट कर कहा,

तुम्हारे लिए तो सिर्फ पत्थर है

मेरा तो विश्वास है यह।

ऐसा कोई नजर नहीं आता

जिस पर यूँ विश्वास होता।

यह पूजने से मुझे संतोष मिलता है,

संसार में ऐसा कुछ और नहीं

जो हो इतना संतोषजनक।

यह पत्थर है बेशक

पर जाने क्यों भावना है मेरे मन में,

कुछ नहीं तो स्थिर है यह एक जगह

ऐसा कहां कोई और,

जो इतना स्थिर है इस जगत में।

सही गलत की बात नहीं

यह नजर नजर का फेर है।

मुझे इसमें श्रद्धा है,

इसलिए मैं पूजन करती हूँ।

यह मेरा भरोसा है,

मिल जाए जहांँ मैं वही रहती हूं।

सुनकर उसकी बातों को

मैंने महसूस किया उस पीर को।

कितनी विचलित होकर वह आई होगी,

ना मिला होगा कहीं और

उस विश्वास को वह यहां पाई होगी।

ना मिलेंगे उसे हरि शायद,

पर बेशक

एक आस अंदर सुगबुगाई होगी।

सच कहती है वह औरत

नजर नजर का फेर है,

मन मन की बात है।

भावना है अगर कहीं,

आस भी है सिर्फ वहीं।

टिकी है यह दुनिया उसी एक आस पर,

चलते रहो बस तुम उसी एक विश्वास पर।।

कविता चतुर्वेदी की कविताएं, लोकमंच पत्रिका
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2. कुछ अपने ऐसे भी

पड़ गई हैं गाँठें जहां-तहां अब रिश्तों में,

तोड़ते हैं हर बार जोड़ते हैं कई क़िस्तों में..

बदलने लगी है यह दुनिया अब हर दिन रात में,

खुदगर्ज़ी भी तो करतें हैं अपनों के ही साथ में..

बीते दिनों की याद हमें अब अति है हर बार,

टूटते नज़र आते हैं जब सारे रिश्ते सारे ख़्वाब..

तोलती हूंँ बैठी-बैठी अपने मन की गहराई को,

छुपाती मिटाती हूंँ जमाने से मैं दी अपनों की रुसवाई को..

दीमक बनकर चाट गए हैं कुछ अपने कुछ रिश्तेदार,

यौन शोषण भी तो किया है जानने वालों ने ही हर बार..

किस मिट्टी के बने यह लोग हैं कैसे यह रिश्ते हैं,

टूटते जा रहे हर रोज़ अब सारे यह नाते हैं..

टूटते हैं सारे सपने बिखरते हैं पल भर में,

लगता है पूरा शहर अजनबी सा एक पल में..

मांँ बाप को भी कभी ना पहचाना है इन्होंने,

पैदा कर पाल पोस बड़ा किया था जिन्होंने..

दूसरों की बेटी बहन को अपनी जायदाद समझ बैठे हैं,

अपने ही घर की लड़की के साथ यह पाप कर बैठे हैं..

भरोसा ना करना गै़रों पर मांँ ने हर दिन सिखलाया था,

पर,अपनों से भी बचकर रहना, यह तो कभी ना बतलाया था..

कुछ अपनों ने हमें ग़लत बहलाया है,

कुछ अपनों ने ही हमें बहुत तड़पाया है..

कुछ धुँधली पड़ी यादों को फिर से उभरते पाया है,

ये ग़ैरों ने ही तो हर बार मरहम लगाया है…

समाज का हमने एक यह भी पहलू देखा है,

अपनों के दुष्कर्मों को मैंने वहाँ दबते देखा है..,

यौन उत्पीड़न किसी का हो जाए तो ना उठाते हैं इतना विवाद,

गर मर्ज़ी से कोई कदम बढा़या तो कर जाते हैं यह अपवाद…

ख़्वाब जो देखा था बचपन में, बनकर रह गया था राज,

बिखरा-बिखरा सा लगा है हमें, हर रिश्ता जाने क्यों आज…।।

कविता चतुर्वेदी की कविताएं, लोकमंच पत्रिका
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3. आंँगन का बंँटवारा

यह जो अपने लोग दिखते हैं अजनबी से,

लगता नहीं कभी इधर का नाता भी रहा हो इनसे..

यह जो दीवार खड़ी है आंँगन के ठीक बीचों बीच,

इसका हाव – भाव और रंग भी है थोड़ा अजीब..

यह बाकी दीवारों की तरह पुरानी भी नहीं है,

और एक आंँगन को दो भागों में बाँटी हुई है..

ऐसा लगता है जैसे अब सारी पुरानी दीवारें काफ़ी कमज़ोर हो चलीं हैं,

अब इस घर पर उस नई दीवार का क़ब्ज़ा है जो काफ़ी मज़बूत सी लगती है..।

यह जो छत है इस घर की आज भी एक ही है,

पर एक सीमित अलग-अलग भागों में बाँट दी गई है..

छत का हर हिस्सा एक दूसरे से आपस में मिलते हैं,

पर घर के लोग केवल अपने हिस्से में ही दिखतें हैं..

यह जो मायूस से पर्दे लटक रहें हैं एक ही दरवाज़े पर,

कभी यह लटकते थे घर के अलग-अलग दरवाज़ों पर..

ऐसा लगता है जैसे ये भी एक जगह लटकते लटकते अब बोर हो गए हैं,

याद आती है इन्हें चंद दिनों के अजनबियों की या कुछ पुराने अपनों की..।

यह जो नीम का पेड़ है आंँगन के बीचों-बीच,

जो गाता था हवा के साथ हर रोज कई मधुर संगीत..

इसकी टहनियों से हम हर सुबह दातुन बनाया करते थे

भरी दुपहरी में सब इसकी गोल आकार वाली छाँव में बैठे रहते थें..

अब इसकी छांँव आधे चांँद वाली आकार सी उभरती है,

पेड़ की आधी टहनी दीवार के उस तरफ को लटकती है..

इस पेड़ के पत्ते अब वियोग में पड़े अधमरे से दिखने लगे हैं,

शायद दुख है इन्हें की ये पेड़ की आधी टहनी से बिछड़े हुए हैं..।

आंँगन के बीच की दीवार में एक छोटा सा छेद है,

कभी मैं उसमें से उस तरफ के लोगों को देखती हूंँ,जो अपने से दिखते हैं..

उस तरफ की दीवारों को देखती हूंँ तो ऐसा लगता है,

जैसे मेरे छुप के देखने से वे सारे मुझ पर हंँसते हैं..

दरवाज़े पर लटकते नए परदों को देखती हूंँ जो मुझे अजनबी समझते हैं,

मुझे पहचानते नहीं इसलिए वे मुझे चोर समझते हैं

कभी-कभी वह छोटा छेद मुझे बंद भी मिलता है….

कविता चतुर्वेदी की कविताएं, लोकमंच पत्रिका
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कविता चतुर्वेदी ने दिल्ली विश्वविद्यालय के लक्ष्मीबाई महाविद्यालय से पढ़ाई की है. स्त्री सशक्तिकरण और भारतीय परिवारों के बिखरने पर लिखी गईं उनकी कविताओं की साहित्य जगत में खूब प्रशंसा मिली है.


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