लोकमंच पत्रिका

लोकचेतना को समर्पित
लोकनाट्य ‘रामलीला’- अरुण कुमार

‘रामलीला’ राम की पौराणिक गाथा पर आधारित एक प्रसिद्ध लोकनाट्य है। ‘रामलीला’ शब्द ‘राम’ और ‘लीला’ दो शब्दों के योग से बना है जिसका अर्थ होता है राम के आचरण का ध्यान, दर्शन या चिंतन। लीला विशुद्ध नाटक के अर्थ का पर्यायवाची न होकर आध्यात्मिक आनन्द के अर्थ को प्रस्तुत करता है। सामान्य शब्दों में कहें तो राम के लीलामय जीवन का अभिनय ही ‘रामलीला’ कहलाता है। राम का जीवन यथार्थ और आदर्श का अद्भुत समन्वय है। यही कारण है कि रामकथा का अभिनय सामान्य जनता को भौतिक और आध्यात्मिक आनंद के साथ-साथ ज्ञान भी प्रदान करता है। हमारे देश में रामकथा को प्रस्तुत  करने की परंपरा के चार पक्ष रहे हैं- मौखिक, साहित्यिक, प्रदर्शन और रूपांकन। इन चारों परंपराओं में मौखिक और प्रदर्शन परंपराओं की लोकप्रियता सबसे अधिक रही है क्योंकि इसकी पहुंच आम जनता तक बहुत ही सहजता से हो जाती है और इसे समझना भी आसान होता है। रामकथा के प्रदर्शनकारी रूपों में सबसे अधिक लोकप्रिय लोकनाट्य ‘रामलीला है’। इसमें भक्ति और अनुभूति, श्रद्धा और प्रेम, दर्शन और श्रवण के साथ आस्था और मनोरंजन का भी समावेश होता है।

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भारत में ही नहीं बल्कि विश्व के कई देशों में राम लोकप्रिय हैं। यही कारण है कि रामकथा के अभिनय की परंपरा हमारे देश की सीमाओं को लांघकर विदेशों तक पहुंच गई है। रामकथा भारतीय संस्कृति की ऐसी प्रतिनिधि गाथा बन गई है जो हजारों वर्षों से भारतीय लोकमानस में रची-बसी है। जहां भी भारतीय गए वहां उनके साथ रामकथा भी गई। रामकथा वहां की संस्कृति का न केवल अंग बनी बल्कि वहां की संस्कृति के निर्माण भी योगदान दिया। वहां की भाषाओं में रची गई और प्रमुख नाट्यरूप बनकर वहां की कलाओं को न केवल प्रभावित किया बल्कि गढ़ा भी। वहां की स्थानीय विशेषताओं को आत्मसात कर अपनी अलग पहचान भी बनाई। विश्व के कई देशों में आज भी रामलीला का मंचन होता है और मंचन की यह परंपरा बहुत पुरानी भी है।

दक्षिण-पूर्व एशिया के इतिहास में कुछ ऐसे प्रमाण मिलते हैं जिनसे पता चलता है कि इस क्षेत्र में प्राचीन काल से ही रामलीला का प्रचलन रहा है। जावा के सम्राट वलितुंग के 907 ई के एक  शिलालेख में एक समारोह का वर्णन है जिसके अनुसार सिजालुक ने नृत्य और गीत के साथ रामायण का प्रदर्शन किया था। थाई नरेश बोरमत्रयी (ब्रह्मत्रयी) लोकनाथ की राजभवन नियमावली में रामलीला का उल्लेख है। इंडोनेशिया, मलेशिया, बाली, म्यांमार आदि कई देशों में आज भी रामलीला का मंचन होता है जो जनता में बहुत लोकप्रिय है।

रामलीला के आदि प्रवर्तक को लेकर विद्वानों में मतभेद है। भावुक भक्तों की दृष्टि में हमारे देश में भगवान राम की भांति रामलीला का मंचन भी अनादि काल से हो रहा है। कुछ विद्वानों का मानना है कि त्रेता युग में भगवान श्रीराम के वनगमन के बाद अयोध्यावासियों ने उनकी याद में राम की बाल लीलाओं का अभिनय करना प्रारंभ किया था। राम के अयोध्या वापस आने के बाद भी अभिनय की यह परम्परा लोकनाट्य के रूप में जारी रही और धीरे-धीरे पूरे देश में फैल गई। एक जनश्रुति के अनुसार रामलीला की शुरुआत करने का श्रेय मेधा भगत को दिया जाता है। कहा जाता है कि काशी निवासी मेधा भगत को भगवान राम ने स्वप्न में दर्शन देकर लीला करने को कहा ताकि भक्तों को उनके बारे में बताया जा सके। कुछ विद्वान रामलीला की गायन परम्परा की शुरुआत का श्रेय वाल्मीकि को देते हैं। उनका मानना है कि महर्षि वाल्मीकि द्वारा शिक्षित लव-कुश रामकथा का गायन करते थे।

विद्वानों का एक समूह यह भी मानता है कि रामलीला की अभिनय परम्परा के आदि प्रवर्तक ‘रामचरित मानस’ के रचयिता गोस्वामी तुलसीदास हैं। उन्होंने अवधी भाषा में जन मनोरंजनकारी नाटकों का अभाव पाकर रामलीला की शुरुआत की थी। उनकी प्रेरणा से अयोध्या और काशी के तुलसी घाट पर पहली बार रामलीला का मंचन आम जनता द्वारा किया गया था। तुलसीदास के शिष्यों ने काशी, चित्रकूट और अयोध्या में रामचरित मानस की कहानी और संवादों पर आधारित रामलीला का मंचन जारी रखा। कुछ इतिहासकारों का मानना है कि मंचीय रामलीला की शुरुआत 16 वीं सदी के आरम्भ में हुई थी। इससे पूर्व रामबारात के शास्त्र आधारित मंचन ही हुआ करते थे। कुछ विद्वान यह भी मानते हैं कि 1783 ई में काशी नरेश उदित नारायण सिंह ने रामनगर में प्रत्येक वर्ष रामलीला का मंचन कराने का संकल्प लिया था। काशी नरेश की प्रेरणा से रामनगर में जो रामलीला की शुरुआत हुई वह आज तक जारी है. यह रामलीला देश के सबसे प्राचीन रामलीलाओं में से एक है।

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रामलीला का मंचन दशहरा एवं चैत्र की रामनवमी के अवसर पर किया जाता है। इसमें रामकथा के जिन अंशों का प्रदर्शन किया जाता है उनमें राम जन्म, धनुष यज्ञ, सीता स्वयंवर, परशुराम-लक्ष्मण संवाद, लक्ष्मण-मेघनाद युध्द, राम-रावण युद्ध, राम का राज्याभिषेक, भरत मिलाप, सीता-परित्याग आदि प्रमुख हैं। व्यापक स्तर पर प्रस्तुत इस नाट्यरूप में क्षेत्रीय विविधता भी है। अलग-अलग क्षेत्रों की रामलीलाओं के दृश्यों में या तो कुछ जोड़ दिया जाता है या फिर कुछ छोड़ दिया जाता है। क्षेत्रीय संस्कृति का प्रभाव रामलीला के मंचन पर स्पष्ट दिखाई देता है। क्षेत्रीय कवि अपने यहां मंचित रामलीलाओं में गीतों व कविताओं को भी जोड़ देते हैं। राम-सीता विवाह को अलग-अलग क्षेत्रों की रामलीलाओं में अलग-अलग ढंग से प्रस्तुत किया जाता है।

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रामकथा से संबंधित होने के कारण रामलीला एक धार्मिक आयोजन भी है । यह कई दिनों तक चलता है। राम के जन्म से लेकर उनके राज्याभिषेक तक की घटनाओं को कई नाट्य दिवसों में विभाजित कर दिया जाता है। एक दिन में एक या दो प्रसंग अभिनीत होते हैं। इसके आधार पर कहीं रामलीला का मंचन दस या ग्यारह दिनों तक होता है तो कहीं पन्द्रह या बीस दिनों तक। पूरी रामकथा एक ही दिन में कहीं भी सम्पन्न नहीं होती। इसके कारण दर्शक कई दिनों तक धार्मिक वातावरण का अनुभव करते हैं।

रामलीला का मंचन रात्रि से प्रारंभ होकर प्रातः सूर्य की प्रथम किरण तक होता है। मंचन के समय विविध देवी देवताओं की झांकियां सजाई जाती है और सवारी निकाली जाती है। रामलीला की भिन्न-भिन्न शैलियां भिन्न-भिन्न स्थानों में प्रचलित हैं। बहुस्थलीय शैली, झांकी शैली, जुलूस शैली, रंगभूमि शैली, प्लेटफ़ॉर्म शैली, आधुनिक नाट्य प्रदर्शन शैली आदि। रामलीला की बहुस्तरीय दृश्य योजना लोक रंगमंच का अनूठा प्रयोग है। यहां रामकथा में घटित घटनाओं के लिए बहुत से मंच स्थायी रूप से बनाए गए हैं। जैसे- अयोध्या, जनकपुरी, सरयू नदी, पंचवटी, लंका आदि। इस तरह तीन प्रकार की रामलीलाओं का आयोजन होता है- सचल, अचल तथा मंचीय। एक ही रामलीला इन अलग-अलग मंचों पर अभिनीत होती है। दर्शक भी अलग-अलग स्थानों पर जाकर रामलीला का आनंद लेते हैं।

लोकनाट्यों का रंगमंच स्थायी न होकर अस्थायी ही रहा है। जब लोकनाट्यों का मंचन करना होता है तभी मंच का निर्माण कर लिया जाता है। रामलीला के मंचीकरण पर उसके सफल या असफल होने का कोई प्रभाव नहीं पड़ता है। मंच चारों ओर से खुले होते हैं और दर्शक को जहां भी स्थान मिल जाए वहीं बैठ जाते हैं। मंच पर सजावट के लिए आम के पत्तों की लड़ियां बनाकर जगह-जगह लटका दी जाती हैं।

रामलीला का मंच खुले मैदान में दो या तीन तख्तों और दो रंगीन पर्दों से तैयार कर लिया जाता है। एक पर्दा नेपथ्य और रंगभूमि के बीच में और दूसरा पर्दा दर्शकों के सामने होता है। इस पर्दे को ही दृश्य या अंक बदलने के साथ आवश्यकतानुसार उठाया या गिराया जाता है। दर्शक खुले मैदान में मंच के सामने बैठते हैं। रंगभूमि के एक ओर व्यास मंडली और वाद्य यंत्रों को बजाने वाले बैठते हैं। मुख्य प्रस्तोता को व्यास कहते हैं जो अपनी एक मंडली के साथ रामचरित मानस के दोहों और चौपाइयों को वाद्य यंत्रों के साथ गाकर कथा को आगे बढ़ाता है। व्यास मंडली के निर्देशों और संकेतों के आधार पर पात्र मंच पर आकर अभिनय करते हैं। अन्य लोकनाटकों की भांति रामलीला में भी पात्रों को संवाद जोड़ने या घटाने की स्वतंत्रता होती है। सामान्यतः एक ही समय में मंच पर दो दृश्य भी दिखाए जाते हैं। उदाहरण के रूप में एक ही समय मंच पर राम-रावण युद्ध के साथ-साथ अशोक वाटिका में सीता को चिंतित अवस्था में भी दिखाया जाता है।

रामलीला की श्रेष्ठता का रहस्य उसकी भावात्मक व्यापकता है। यह एक ऐसा लोकनाट्य है जिसमें दर्शक भी पात्र की श्रेणी में आकर अभिनय करने लगता है। राम के वनवास जाते समय दर्शक स्वयं को अयोध्यावासी समझकर आंसू बहाने लगता है। रामलीला कहीं भी मंचित हो, उसे धार्मिक अनुष्ठान के रूप में ही आयोजित किया जाता है। इसमें भक्ति भावना की प्रधानता होती है। रामलीला में भाग लेने वाले कलाकार व्यवसायी नहीं होते। वे रामलीला का हिस्सा होने में गर्व महसूस करते हैं।

हिन्दी ऑनर्स के विद्यार्थियों के लिए उपयोगी

लेखक- डॉ अरुण कुमार, असिस्टेंट प्रोफ़ेसर, लक्ष्मीबाई महाविद्यालय, दिल्ली विश्वविद्यालय, सम्पर्क- 8178055172, 9999445502

29 thoughts on “लोकनाट्य ‘रामलीला’- अरुण कुमार

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