लोकमंच पत्रिका

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कहानी के तत्व- अरुण कुमार

बी.ए/बी.कॉम ( प्रोग्राम ) के विद्यार्थियों के लिए उपयोगी

कहानी की साहित्य की सभी विधाओं में कहानी एक लोकप्रिय विधा है। प्राचीन काल में कहानी को कथा, आख्यायिका, गल्प आदि कहा जाता था। आधुनिक काल में कहानी शब्द ही अधिक प्रचलित है। पहले कहानी का उद्देश्य उपदेश देना और मनोरंजन करना होता था। वर्तमान में इसका उद्देश्य मानव जीवन की विभिन्न समस्याओं और संवेदनाओं को अभिव्यक्त करना है। यही कारण है कि प्राचीन कथा से आधुनिक हिन्दी कहानी कथ्य और शिल्प दोनों दृष्टियों से भिन्न है।

कहानी के मुख्यतः छह तत्व माने जाते हैं-

कथा वस्तु-

कथा-वस्तु मानव-जीवन के विभिन्न क्षेत्रों से संबंधित होती है। यह कहानी के शुरू से लेकर अंत तक चलती है। वैसे तो कथा-वस्तु की पांच अवस्थाएं होती हैं- आरम्भ, विकास, कौतूहल, चरमसीमा और अंत। प्रत्येक कहानी में उक्त पांचों अवस्थाएं हो ही यह आवश्यक नहीं है। कथा-वस्तु में घटनाएं होती हैं। प्रत्येक कहानी में कम-से-कम एक घटना अवश्य होती है। वर्तमान कहानी लेखन में घटना तत्व अत्यंत सूक्ष्म होते जा रहे हैं। अब घटनाओं पर विशेष बल नहीं दिया जाता है। संक्षिप्तता किसी भी कहानी की कथा-वस्तु का अनिवार्य गुण है।

चरित्र चित्रण-

कहानी किसी व्यक्ति की होती है। यह व्यक्ति ही कहानी में चरित्र कहलाता है। कहानी में चरित्रों की संख्या कम-से-कम होनी चाहिए ताकि कहानीकार उन चरित्रों का अधिक गहराई से चित्रण कर सके। एक कहानीकार किसी चरित्र के आंतरिक और बाहरी दोनों पक्षों का चित्रण करता है। कथा-वस्तु से चरित्र-चित्रण का घनिष्ठ संबंध होता है।

संवाद-

संवाद कहानी का अभिन्न अंग माना जाता है। पात्र द्वारा कही गई बातों को संवाद कहा जाता है। संवाद के माध्यम से पात्र या चरित्र जीवन्त और स्वाभाविक बनते हैं। वर्तमान में ऐसी भी कहानियां लिखी जा रही हैं जिनमें संवाद बहुत कम होते हैं। पूरी कहानी ही वर्णनात्मक या मनोविश्लेषणात्मक शैली में लिखी जा रही हैं।

देशकाल या वातावरण-

कोई भी कहानी अपने देशकाल की उपज होती है इसलिए हर समाज या समय की कहानी अलग-अलग होती है। प्रत्येक कहानी की अपनी संस्कृति, सभ्यता और संस्कार होता है जो कहानी में स्वतः उपस्थित हो जाता है। देशकाल किसी भी कहानी का आधार होता है जिसपर सारे कार्यकलाप होते हैं। जयशंकर प्रसाद की कहानी ‘पुरस्कार’ में नायिका मधुलिका के चरित्र चित्रण के साथ-साथ देशकाल का भी चित्रण किया गया है।

शैली-

शैली कहानी को सुसज्जित करने वाला कलात्मक आवरण होता है। कहानी कहने या लिखने के ढंग को कहानी की शैली कह सकते हैं। यह कहानीकार के आंतरिक व बाहरी पक्षों से संबंधित होता है। कहानीकार अपनी कहानी को वर्णनात्मक, संवादात्मक, आत्मकथात्मक, विवरणात्मक, चित्रात्मक आदि किसी भी रूप में लिख सकता है। यह उसकी प्रतिभा पर निर्भर करती है। यही किसी कहानीकार की शैली है। कहानी की शैली ऐसी हो कि पाठक उसकी ओर आकर्षित हो। कहानी का आरम्भ, मध्य और अंत सुगठित होनी चाहिए व उसका शीर्षक भी लघु और रोचक होनी चाहिए। शैली के अंतर्गत भाषा भी आती है। कहानी को प्रभावशाली बनाने के लिए कहानीकार को कुछ शब्दों में बहुत कहने की कला आनी चाहिए।

उद्देश्य-

साहित्य की कोई भी रचना बिना उद्देश्य के नहीं लिखी जाती है। ठीक उसी प्रकार प्रत्येक कहानी का अपना एक विशेष उद्देश्य होता है। यह उद्देश्य कहानी के आवरण में छिपा रहता है। कहानीकार कहानी के उद्देश्य को सीधे-सीधे अभिव्यक्त नहीं करता है बल्कि वह कहानी इस तरह लिखता है कि पाठक को पूरी कहानी पढ़ने के बाद उसके उद्देश्य का पता चलता है। प्राचीन कहानियों का उद्देश्य मनोरंजन या उपदेश देना होता था किंतु वर्तमान में मानव जीवन की विभिन्न समस्याओं का चित्रण करना कहानीकार का उद्देश्य है।

लेखकडॉ अरुण कुमार, असिस्टेंट प्रोफेसर, लक्ष्मीबाई महाविद्यालय, दिल्ली विश्वविद्यालय। सम्पर्क- 8178055172 arunlbc26@gmail.com

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