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गीतिकाव्य का संक्षिप्त परिचय- अरुण कुमार

अवधारणात्मक साहित्यिक पद

मानव के व्यक्तिगत अनुभव, भावावेश में संगीतमय होकर कोमलकान्त पदावली के माध्यम से जब अभिव्यक्त होते हैं तो उसे गीत कहते हैं। भारतीय साहित्य में गीत की परंपरा बहुत पुरानी है। प्राचीन समय के सम्पूर्ण भारतीय साहित्य ही गीतों के रूप में रचे गए हैं इसलिए भारत में गीतिकाव्य का कोई अलग अस्तित्व नहीं रहा। अंग्रेज़ी में गीतिकाव्य की एक अलग परंपरा रही है। अंग्रेज़ी में गीति को ‘लिरिक‘ कहते हैं। ‘लायर‘ पर गाए जाने वाले काव्य को ‘लिरिक’ कहते हैं। जिसे अंग्रेज़ी में लायर कहते हैं वह ग्रीक शब्द ‘लूरा’ से बनाया गया है। यह एक प्रकार का अति प्राचीन ग्रीक वाद्ययंत्र था, जिसके सहारे गीत गाए जाते थे। इन गीतों को वहां लुरिकोस‘ कहते थे और अंग्रेज़ी में आकर इसका नाम लिरिक हो गया। कुछ समय के बाद लायर पर गाए जाने की बात समाप्त हो गई और गीत शब्द माधुर्य तथा लय से सम्बद्ध हो गए। बाद में चलकर आत्माभिव्यक्ति ही लिरिक की एकमात्र विशेषता रह गयी और वह कवि के अंतर्जगत पर ही केन्द्रित हो गई। दूसरे शब्दों में कहें तो व्यक्तिगत भावना की अभिव्यक्ति ही गीतिकाव्य की सबसे प्रमुख विशेषता बन गई।

गीतिकाव्य के बारे में पाश्चात्य विद्वानों ने अपने-अपने विचार प्रस्तुत किए हैं। हीगेल ने अपनी पुस्तक ‘ सौंदर्यशास्त्र’ में लिखा है कि- “जब कवि विश्व के अंतःकरण में पहुंचकर आत्मानुभूति करता है, तब उसे अपनी चित्तवृत्ति के अनुसार काव्योचित भाषा में व्यक्त कर देता है, उसे गीत कहते हैं। अर्नेस्ट राइस का कहना है कि- “ सच्चा गीत वही है जो भाव या भावात्मकता विचार का भाषा में स्वाभाविक विस्फोट हो।” हिन्दी साहित्य में महादेवी वर्मा के गीतों को खूब लोकप्रियता मिली। उन्होंने गीतिकाव्य पर विचार करते हुए लिखा है कि – “गीत का चिरंतन विषय रागात्मिकता वृत्ति से सम्बद्ध रखने वाली सुख एवं दु:खात्मक अनुभूति से रहेगा।

दिनकर ने गीतों को काव्य का निचुड़ा हुआ रस माना है तो गुलाब राय ने लिखा है कि यह काव्य की अन्य विधाओं की अपेक्षा अधिक अन्तःप्रेरित होता है और इसी कारण इसमें कला होते हुए भी कृत्रिमता का अभाव होता है। उक्त सभी परिभाषाओं के आधार पर कहा जा सकता है कि गीत व्यक्तिगत सीमा में सुख- दु:खात्मक अनुभूति का शब्द रूप है जो अपनी ध्वन्यात्मकता में गेय और कोमलकान्त पदावली से संयुक्त हो। गीतिकाव्य रचनाकार के अंतर्मन को बहिर्जगत में प्रस्तुत करने का सशक्त माध्यम है।

इस आधार पर गीतिकाव्य की निम्नलिखित विशेषताएं हो सकती हैं-

अंतर्जगत का चित्रण

सहज स्फुरित उद्गार

कोमलकान्त पदावली

संगीत से पूर्ण अभिव्यक्ति

संक्षेप में अभिव्यक्ति

भारतीय साहित्य में गीतिकाव्य की परंपरा अत्यंत प्राचीन है। मानव ने अपनी भावनाओं और अनुभूतियों को अभिव्यक्त करने के लिए वाणी की गेयता को अधिक महत्व दिया है। यही कारण है कि विश्व के प्राचीनतम साहित्य का रूप गेय ही रहा है, जिसकी आरम्भिक पंक्तियां वाल्मीकि के कंठ से निकली थीं-

मा निषाद, प्रतिष्ठां त्वमगमः शास्वती समा: ।

यतक्रौंच-मिथुनादेकमवधी: काममोहितम।।

आदिमानव के भावों की अभिव्यक्ति के साथ ही गीतिकाव्य का जन्म हुआ। गीतिकाव्य का इतिहास वेदों से ही प्रारंभ होता है। सामवेद तो गायन ही है। सामवेद की ऋचाओं से शुरू होकर उपनिषदों की स्तुतियों तथा बौद्ध धर्म से संबंधित कथाओं तक में हमें गीतिकाव्य के तत्व दिखाई देते हैं। इनमें केवल धार्मिक, सामाजिक तथा शांति के तत्व ही अधिक अभिव्यक्त हुए हैं जो गीतों के महत्वपूर्ण उदाहरण हैं।  हिन्दी साहित्य के सन्दर्भ में गीतिकाव्य की परंपरा का विश्लेषण करें तो हम पाते हैं कि चारों कालों में और वर्तमान समय तक इसकी एक समृद्ध परंपरा मौजूद रही है। 

आदिकाल में गीतिकाव्य

आदिकाल के अधिकांश कवि राजाओं और सामन्तों के आश्रय में रहते थे। आदिकाल के ग्रंथों का मुख्य विषय युद्धों और वीरता का वर्णन करना है। इस काल के कवि युद्ध भूमि में सैनिक की तरह भाग लेते हैं इसलिए उन्होंने युद्धों का सजीव वर्णन किया है। ये ग्रंथ गेय शैली में लिखे गए हैं जिससे राजा तथा प्रजा दोनों युद्ध के लिए प्रोत्साहित किए जाते थे। इन गीतों ने रानियों को सतीत्व की रक्षा के लिए अग्नि में जल जाने के लिए भी प्रेरित किया। ये गीत वीर रस से परिपूर्ण होते थे जिनमें उत्साहवर्धक शब्दावली का प्रयोग एवं वीरों की प्रशंसा निहित होती थी। ये कवि राजाओं के मनोरंजन के लिए भी गीतों की रचना करते थे जिसमें श्रृंगार रस की प्रधानता होती थी। आल्ह खण्ड, संदेश रासक, पृथ्वीराज रासो आदि ग्रंथ गीतिकाव्य के भी श्रेष्ठ उदाहरण हैं। विद्यापति ने मैथिली भाषा में राधा और कृष्ण की लीलाओं का संगीतमय भाषा में गान किया है जो आज भी लोकप्रिय हैं। अमीर खुसरो के गीतों विशेषकर झूले के गीतों में लोकगीतों का माधुर्य झलकता है। लोकगीतों की टेक’ पद्धति का प्रयोग सर्वप्रथम प्रयोग खुसरो ने ही किया था।

अवधारणात्मक साहित्यिक पद के अंतर्गत यह भी पढ़ें- मानववाद – http://www.lokmanch.in/?p=1545

भक्तिकाल में गीतिकाव्य परंपरा

गीतिकाव्य परंपरा को भक्तिकाल में व्यवस्थित रूप प्राप्त हुआ। यह भी कहा जा सकता है कि हिन्दी गीतिकाव्य का शैशवकाल भक्तिकाल तक आते-आते अपनी यौवनावस्था को प्राप्त हुआ। गीतिकाव्य को उसके शैशव से निकाल कर किशोर और युवा बनाने में महत्वपूर्ण भूमिका विद्यापति ने निभाई। कृष्ण भक्ति का आश्रय लेकर उन्होंने ‘गीत गोविन्द के आधार पर पदों की रचना की। जयदेव के गीत गोविन्द का उन्होंने कथ्य एवं शिल्प दोनों ले लिया। इसी कारण विद्यापति को ‘हिन्दी का जयदेव भी कहा जाता है। मीराबाई की समस्त पदावली आत्माभिव्यक्ति के रुप में हुई है। उनका गीतिकाव्य संगीत के अधिक निकट है और काव्य के कम। उनके हृदय में निर्झर के समान भाव आए और अनुकूल स्थल पाकर गीतों में बह निकले।

मैं तो साँवरे के रंग राँची।

साजि सिंगार बाँधि पग घुंघरू, लोक लाज तजि नाची।

मीरा ने अपने संगीत के माध्यम से अपने गिरिधर गोपाल को प्रसन्न किया था। वे केवल मधुर लय से गाती ही नहीं थी अपितु गिरिधर गोपाल के समक्ष नृत्य भी करती थी। 

सूरदास राधा और कृष्ण की लीलाओं के गायक थे। उन्होंने अपनी समस्त रचना गीतों में करके भगवान कृष्ण के चरणों में अर्पित की। उनकी शैली पर जयदेव और विद्यापति की शैली का प्रभाव है। उनके समस्त गीत आकार में छोटे किन्तु संगीत के सुर ताल में खरे उतरने वाले हैं। सूर के गीतों में इतना माधुर्य था कि महाकवि वल्लभाचार्य आनन्द में निमग्न हो जाते थे। सूरदास के गीतों में श्रृंगारिक भाव और कोमलकान्त पदावली का सुन्दर प्रयोग हुआ है-

चरन कमल बन्दौं हरिराई।

जाकी कृपा पंगु गिरी-लंघै, अंधे को सब कुछ दरसाई।।

कबीर की कविता का वह पक्ष शुष्क तथा नीरस है जहां उनकी प्रकृति उपदेशात्मक है, परन्तु जहां उन्होंने अपने हृदय की अनुभूति को वाणी दी है, वह अत्यंत सरस और मधुर है। तुलसीदास, नन्ददास आदि कवियों ने भी गीतिकाव्य की रचना की है।

अवधारणात्मक साहित्यिक पद के अन्तर्गत यह भी पढ़ें- स्वच्छंदतावाद – http://www.lokmanch.in/?p=1434

रीतिकाल में गीतिकाव्य

रीतिकाल में गीतों की रचना नहीं हुई। रीतिबद्ध रचना की लोकप्रियता के कारण गीतिकाव्य को प्रोत्साहन न मिल सका। रीतिकाल में न भावों की मौलिकता थी और न भाषा एवं शब्द लालित्य। संगीतात्मकता की दृष्टि से भी रीतिकालीन काव्य की कोई विशेषता नहीं है इसी कारण रीतिकाल में गीतिकाव्य का समुचित विकास नहीं हुआ। भक्तिकाल में गीतिकाव्य का जो विकास हुआ था वह रीतिकाल में एक तरह से थम गया। 

आधुनिक काल में गीतिकाव्य

आधुनिक काल में गीतिकाव्य का पुनरुद्धार भारतेंदु हरिश्चंद्र ने किया। भारतेन्दु के गीतिकाव्य में दो धाराएं हैं। एक पर तो विद्यापति, चंडीदास, सूर, तुलसी, मीरा द्वारा प्रतिष्ठित परंपरा की प्राचीन शैली का प्रभाव है, जिसमें आत्म निवेदन अभिव्यक्त हुआ है। चन्द्रावली नाटिका के इस गीत को उदाहरण के रूप में समझा जा सकता है-

पिय तोहि कैसे हिये राखौं छिपाय।

सुन्दर रूप लखत सब कोऊ यहै कसक जिय आय।।

दूसरी शैली के वे राष्ट्रीय गीत हैं जिनमें उनके हृदय की करुणा का स्रोत उमड़ पड़ा है। इनमें कल्पना की अपेक्षा यथार्थ का पुट अधिक है- 

आवहु रोवहु सब मिलि कै भारत भाई।

हा हा भारत दुर्दशा देखी न जाई।।

वियोगिहरि ने भी ब्रजभाषा में सुन्दर गीतों की रचना कर गीतिकाव्य की परंपरा को समृद्ध किया। भारतेन्दु के बाद द्विवेदी युग के प्रतिनिधि गीतकार श्रीधर पाठक और मैथिलीशरण गुप्त हैं। गुप्त जी ने गीतिकाव्य को अपनी लेखनी से इतना संवारा कि वह हर कंठ का हर युग का गान बन गई। गुप्त जी का ‘भारत-भारती’ गीतिकाव्य का श्रेष्ठ उदाहरण है।

छायावाद युग में जयशंकर प्रसाद ने नई गीत शैली की शुरुआत की। उन्होंने छायावादी कविताओं के माध्यम से गीतिकाव्य की रचना की तो अपने ऐतिहासिक नाटकों में भी कई गीत लिखे। प्रसाद जी के नाटकों में लिखे गीत अत्यंत मनोहर व सुन्दर हैं। सूर्यकांत त्रिपाठी निराला के गीतों में भाषा और शब्द भावों के अनुकूल है। उनका यह गीत काफी लोकप्रिय है- 

अलि घिर आए घन पावस के, लख ये काले-काले बादल

निल सिंधु में खिले कमल दल हरित ज्योति,

चपला अति चंचल सौरभ के रस के।

सुमित्रानन्दन पन्त की कविताओं में यद्यपि गीतितत्व का पूर्ण निर्वाह नहीं है, फिर भी उनके कुछ गीत बहुत सुंदर हैं। उनके गीतों में भावों की मनोहरता है और शब्द-चयन भी सुन्दर हैं। महादेवी वर्मा के गीत हिन्दी साहित्य की निधि हैं। उन्होंने प्रकृति का मानवीकरण कर सुन्दर गीतों की रचना की है। उनका ‘आ बसन्त रजनी’ वाला गीत इसका सुन्दर उदाहरण है। उनकी अपनी शैली है और अपनी प्रवृत्ति है। हरिवंश राय बच्चन ने भी सुन्दर गीतों की रचना की है। वे गीत को कवि के हृदय का उपहार नहीं, उसकी विकलता कहते हैं- 

भावनाओं की मधुर आधार सांसों से विनिर्मित,

गीत कवि उर का नहीं उपहार उसकी विकलता है।

उनमें जीवन के यथार्थ और दार्शनिक तत्व को गीतों का रूप देने की अपूर्व क्षमता थी। इन गीतकारों के अतिरिक्त सोहनलाल द्विवेदी, नरेन्द्र शर्मा, गोपाल सिंह नेपाली, भगवती चरण वर्मा आदि आधुनिक काल के श्रेष्ठतम गीतकार हैं। हिन्दी साहित्य का वर्तमान युग भी गीतिकाव्य की दृष्टि से अत्यंत समृद्ध है।

लेखक- डॉ अरुण कुमार, असिस्टेंट प्रोफेसर, लक्ष्मीबाई कॉलेज, दिल्ली विश्वविद्यालय। सम्पर्क- 8178055172, 09868719955, arunlbc26@gmail.com

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