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आरक्षण की समीक्षा से डर कैसा- अरुण कुमार

यह आलेख दैनिक जागरण के राष्ट्रीय संस्करण में दिनांक 30 अप्रैल 2020 को प्रकाशित हो चुका है।

सुप्रीम कोर्ट के आरक्षण संबन्धित दिये गए हालिया फैसले से एक बार फिर देश में आरक्षण पर चर्चा शुरू हो गई है। सुप्रीम कोर्ट की संविधान पीठ ने आन्ध्र प्रदेश सरकार के उस फैसले को निरस्त करते हुए जिसमें अनुसूचित क्षेत्रों में अनुसूचित जनजाति को शत-प्रतिशत आरक्षण देने की बात कही गई थी, आरक्षण के संबंध में कई बातें कहीं। अपने इस फैसले में कोर्ट कहा कि जो आरक्षण का लाभ लेकर आगे बढ़ गए हैं उन्हें लगातार आरक्षण का लाभ देना उचित नहीं है। सुप्रीम कोर्ट द्वारा कही गई इन बातों का अर्थ कुछ लोग आरक्षण के खात्मे या उसके औचित्य से लगा रहे हैं। जबकि सुप्रीम कोर्ट की ये बातें आरक्षण की समीक्षा से संबंधित है। आरक्षित समूहों में ही कुछ लोग या परिवार ऐसे हैं जो आरक्षण का लाभ दशकों से ले रहे हैं। ऐसे लोगों का प्रयास आरक्षण को एक ऐसे पवित्र गाय की तरह बना देने का है जिसके बारे में किसी भी तरह की बात करने का उद्देश्य उसे खत्म करना है। उन्हें आरक्षण की समीक्षा से जुड़ी कोई भी बात अपने हितों पर कुठाराघात की तरह लगती है और वे अपने हित को समाज की हित से जोड़ देते हैं।       

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आज लगभग यह चर्चा समाप्त हो गई है कि आरक्षण को समाप्त कर देना चाहिए। कल तक जो लोग आरक्षण विरोधी थे उन्होंने भी अब विरोध करना बंद कर दिया है। आज आरक्षण के कार्यान्वयन पर बात होने लगी है। खुद आरक्षित समूहों के अन्दर एक बड़ा समूह ऐसा है जो इस व्यवस्था में खुद को ठगा हुआ महसूस कर रहा है लेकिन कोई भी उनकी बातें सुनने को तैयार नहीं है। अपने देश में आरक्षण एक भावुक मुद्दा भी बन गया है। सरकारी नौकरियां तेजी से कम हो रही हैं लेकिन आज भी शिक्षित युवाओं की आशाओं का केन्द्र भी वही है, विशेषरूप से सामाजिक रूप से कमजोर वर्गों के लिए। जिस तरह से अनेक सामाजिक समूह अपने लिए आरक्षण की मांग कर रहे हैं उससे साफ लगता है कि सरकारी नौकरियों की तरफ लोग कितनी अधिक आशा भरी निगाह से देख रहे हैं।

एक बात और है कि जब भी किसी वर्ग को आरक्षण देने की घोषणा होती है दूसरा वर्ग विरोध में झंडा उठा लेता है। जब भी किसी आरक्षित वर्ग के अन्दर के समूहों को आरक्षण का लाभ दिलाने के लिए किसी समीक्षा की बात होती है तो इसी के सम्पन्न समूह विरोध में झण्डा उठा लेते हैं। ये बातें अनुसूचित जाति/जनजाति और पिछड़े वर्ग पर पूरी तरह से सही हैं। 1990 के मंडल विरोधी आंदोलन की भयावहता हमे याद है। वहीं अभी कुछ दिनों पहले जब मोदी सरकार ने आर्थिक रूप से कमजोर सवर्णों को आरक्षण देने की घोषणा की तो कुछ गैर-सवर्ण जातियों ने विरोध किया। ओबीसी आरक्षण का विरोध यह कहकर किया गया कि इससे ‘मेरिट’ प्रभावित होगी तो आर्थिक रूप से कमजोर सवर्णों के आरक्षण का विरोध यह कहकर किया जा रहा है कि इस तरह का कोई भी प्रावधान संविधान में नहीं है। विरोध चाहे ‘मेरिट’ के नाम पर हो या संविधान के नाम पर उसके मूल में यही भावना है कि आरक्षण का लाभ मेरे समूह को मिले या केवल मुझे मिले दूसरे समूहों को नहीं।    

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अब आरक्षित श्रेणियों के अंदर भी आरक्षण को लेकर कई तरह की सुगबुगाहटें हैं, जिसकी तरफ सुप्रीम कोर्ट ने इशारा किया है। कोर्ट ने सरकार से आरक्षित श्रेणी के अंदर की सुगबुगाहटों को सुनने और उसे समझने के लिए कहा है। विडम्बना यह भी है कि सरकारों ने अब तक यह जानने की भी कोई कोशिश नहीं की है कि आरक्षण का लाभ संबंधित वर्ग को मिल भी रहा है या नहीं। सरकारों ने यह भी जानने का प्रयास नहीं किया कि आरक्षण का लाभ कौन लोग ले रहे हैं। जबकि अनुसूचित जाति/जनजाति और पिछड़े वर्गों के अन्दर यह बहस आम हो गई है कि इन वर्गों के अन्दर ही जो आर्थिक रूप से मजबूत जातियां हैं वे आरक्षण का पूरा लाभ हड़प जा रही हैं। अनुसूचित जाति/जनजाति आरक्षण के 70 वर्षों और ओबीसी आरक्षण के 27 वर्षों के बाद इन वर्गों के अन्दर एक ऐसा क्रीमीलेयर पैदा हो गया है जो आरक्षण के लाभ को अपने ही समूह में नीचे तक पहुंचने नहीं दे रहा है।

ओबीसी आरक्षण में क्रीमीलेयर का प्रावधान तो लागू है लेकिन इसके अन्दर जो अत्यंत पिछड़ा वर्ग का एक बड़ी आबादी वाला समूह ऐसा है जिसकी स्थिति बहुत खराब है। आज भी केन्द्र सरकार के कार्यालयों में अत्यंत पिछड़ा वर्ग का कर्मचारी शायद ही मिले। अनुसूचित जाति और जनजाति आरक्षण में क्रीमीलेयर से सम्बंधित कोई भी प्रावधान अभी तक लागू नहीं हो पाया है। इसका सबसे बड़ा नुकसान यह है जो आरक्षण की मूल भावना के भी खिलाफ है कि एक ही परिवार में कई-कई बड़े अधिकारी बन जा रहे हैं लेकिन उसी समाज का सबसे निचला हिस्सा शिक्षा के लिए न्यूनतम अवसरों से भी वंचित रह जा रहा है। इसे ऐसे समझा जा सकता है मान लिया जाए कि 1952 में अनुसूचित जाति के किसी व्यक्ति को आरक्षण की व्यवस्था के कारण नौकरी मिली तो उसकी संतान को शिक्षा से जुड़ी तमाम सुविधाएं मिल जाएंगी लेकिन वहीं जो अनुसूचित जाति का दूसरा व्यक्ति किसी कारण लाभ नहीं उठा पाया और वह पिछड़ गया। अब क्या नौकरी प्राप्त व्यक्ति की संतान के साथ दूसरे व्यक्ति की संतान स्पर्धा कर पाएगी? वर्तमान में अनुसूचित जाती/जनजाति वर्ग में आरक्षण का लाभ लेकर एक बड़ी संख्या में ऐसे लोग या परिवार पैदा हो गए हैं। ऐसे लोगों या परिवारों को  देखकर ही उसी वर्ग का अपेक्षाकृत पिछड़ा हिस्सा अब खुले तौर पर कहने लगा है कि अमुक व्यक्ति की संतान को आरक्षण का लाभ क्यों मिल रहा है? 

हालांकि इन सभी बातों के समर्थन में  हमारे पास आंकड़ों का अभाव है। आरक्षित समूहों के लोग भी बार-बार यह कहते हैं कि उन्हें आरक्षण का लाभ मिला ही नहीं क्योंकि अब तक इसे ठीक से लागू ही नहीं किया जा सका है। लेकिन क्या इस बात से इनकार किया जा सकता है कि आरक्षित समूहों को आरक्षण का जो भी लाभ मिला उसे उसी समूह के कुछ सम्पन्न परिवारों ने हड़प लिया। दरअसल, सुप्रीम कोर्ट के कथन को आरक्षण से संबंधित इन्हीं सभी सवालों के जवाब खोजने की कोशिश के संदर्भ में देखना चाहिए। सरकार को चाहिए कि आरक्षण पर सौहार्दपूर्ण माहौल में बात करे उसकी समीक्षा करे ताकि आरक्षित समूहों के अन्दर की पिछड़े समूहों की स्थिति का सही आकलन हो सके। ओबीसी में क्रीमीलेयर लागू है इसलिए वहाँ अत्यंत पिछड़ा वर्ग को आरक्षण का लाभ दिलवाने का प्रयास करना चाहिए इस पर सरकार ने रोहिणी आयोग का गठन भी किया है। एससी/एसटी आरक्षण में क्रीमीलेयर का प्रावधान कर कुछ ही परिवारों को आरक्षण का पूरा लाभ लेने से रोकना चाहिए ताकि जो पीछे छूट गए हैं उन्हें मदद मिल सके।   

लेखक- डॉ अरुण कुमार, दिल्ली विश्वविद्यालय के लक्ष्मीबाई कॉलेज में असिस्टेंट प्रोफेसर हैं। सम्पर्क- 8178055172, 09868719955 ईमेल- arunlbc26@gmail.com

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