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सिनेमा और सेंसर बोर्ड, सिनेमा प्रसारण अधिनियम – अरुण कुमार

अंग्रेज़ी शासन के दौरान जब भारतीय परिदृश्य में महात्मा गांधी का प्रवेश हो चुका था और भारत को गुलामी की जंजीरों से मुक्त कराने के और आम जनता को जागरूक करने के उद्देश्य से स्वतंत्रता सेनानियों ने अखबार के साथ-साथ फिल्म को भी माध्यम बना लिया। ऐसे प्रयासों को रोकने के लिए तत्कालीन ब्रिटिश सरकार ‘सिनेमेटोग्राफी एक्ट 1918’ लेकर आई। इस एक्ट के पहले तक भारतीय फिल्मकार कुछ भी दिखाने के लिए स्वतंत्र थे, लेकिन इसके बाद उन्हें फिल्म प्रदर्शन के लिए भारत के बड़े शहरों में स्थापित सेंसर बोर्ड की स्वीकृति लेनी पड़ती थी। पहले यह सेंसर बोर्ड फिल्मों में से ऐसे दृश्य निकाल देता था जिनसे यूरोपियों की छवि खराब होती थी।

आजादी के बाद 21 मार्च 1952 को  ‘सिनेमेटोग्राफी एक्ट 1918’ में बदलाव कर नया ‘चलचित्र अधिनियम 1952’ अस्तित्व में लाया गया। इस अधिनियम के माध्यम से ‘अभिव्यक्ति की स्वतन्त्रता’ को अधिक महत्व प्रदान किया गया। इस अधिनियम के चार भाग हैं जिसमें 1, 2 और 4 का विस्तार सम्पूर्ण भारत पर है और भाग 3 का विस्तार केवल संघ शासित राज्यों पर है। इस अधिनियम के तहत यह माना गया कि 18 वर्ष की उम्र पार कर चुके युवाओं को ‘वयस्क’ की श्रेणी में रखा जाएगा। अधिनियम की धारा 3 के तहत ‘फ़िल्म प्रमाणीकरण बोर्ड’ का गठन किया गया और कहा गया कि बोर्ड द्वारा प्राप्त प्रमाण पत्र के बाद ही किसी भी फ़िल्म को सार्वजनिक रूप से प्रदर्शित किया जा सकेगा।

सेंट्रल बोर्ड ऑफ फिल्म सर्टिफिकेशन (1 जून, 1983 से सेंट्रल बोर्ड ऑफ फिल्म सेंसर के रूप में जाना जाता है) की स्थापना मुंबई में 15 जनवरी 1952 में की गई थी। ‘केन्द्रीय फ़िल्म प्रमाणन बोर्ड’ या ‘भारतीय सेंसर बोर्ड’ भारत में फिल्मों, टीवी प्रसारणों और विभिन्न दृश्य सामग्री की समीक्षा कर उसे प्रसारण संबंधित निर्णय देने वाला एक विनियामक निकाय है। यह फिल्मों के सार्वजनिक प्रदर्शन पर नियंत्रण रखने वाली संस्था है। यह भारत सरकार के सूचना एवं प्रसारण मंत्रालय के अधीन काम करता है। केन्द्र सरकार द्वारा दो वर्ष के लिए बोर्ड के सदस्यों का चयन किया जाता है। इस बोर्ड में अध्यक्ष के अतिरिक्त 25 अन्य गैर सरकारी सदस्य होते हैं। ये सदस्य कला और सामाजिक क्षेत्रों से संबंधित विशेषज्ञ होते हैं। बोर्ड का मुख्यालय मुम्बई में है। वर्तमान में इसके 9 क्षेत्रीय कार्यालय हैं जो बंगलुरू, कोलकाता, चेन्नई, कटक, गुवाहाटी, हैदराबाद, मुम्बई, नई दिल्ली और तिरुवनंतपुरम में स्थित हैं।

सेंसर बोर्ड की संरचना, कार्य और फिल्मों के लिए सर्टिफिकेट जारी करने की शक्ति, सिनेमैटोग्राफ अधिनियम, 1952 (अधिनियम 37) के आधार पर मिलती है। केन्द्रीय फिल्म प्रमाणन बोर्ड (CBFC) वर्तमान में 4 तरह के सर्टिफिकेट जारी करता है।  शुरुआत में यह सिर्फ 2 तरह के सर्टिफिकेट जारी करता था लेकिन जून, 1983 से इसने यह संख्या बढ़ाकर 4 कर दी है। यह सर्टिफिकेट फिल्‍म शुरु होने से पहले दस सेकेंड के लिए दिखाया जाता है।

अ (अनिर्बन्धित) या यू– इन फिल्मों को सभी आयु वर्ग के व्यक्ति देख सकते हैं।

अ/व या U/A – इस श्रेणी की फिल्मों के कुछ दृश्यों में हिंसा, अश्लील भाषा,  या यौन संबंधित सामग्री हो सकती है। इस प्रमाण-पत्र प्राप्त फ़िल्म को केवल 12 वर्ष की उम्र से अधिक का व्यक्ति ही देख सकता है वह भी किसी व्यस्क व्यक्ति की उपस्थिति में। 

व ( वयस्क )  या ए ( एडल्ट ) – यह वह श्रेणी है जिसके लिए सिर्फ वयस्क यानि केवल 18 वर्ष से अधिक उम्र के व्यक्ति ही देख सकते हैं।

वि (विशेष) या S – यह विशेष श्रेणी है। इससे संबंधित प्रमाण-पत्र उन फिल्मों को प्रदान किए जाते हैं जो विशेष दर्शकों अर्थात डॉक्टर या इंजीनियर आदि को देखने के लिए बनाए जाते हैं। 

भारत में हर साल 1250 से अधिक फीचर फिल्में और लघु फिल्में बनतीं हैं. एक अनुमान के अनुसार, भारत में हर दिन लगभग 15 मिलियन लोग (13,000 से अधिक सिनेमा घरों में या वीडियो कैसेट रिकॉर्डर पर या केबल सिस्टम पर) फिल्में देखते हैं। वर्तमान में, भारतीय फिल्म उद्योग का कुल राजस्व 13,800 करोड़ रुपये (2.1 अरब डॉलर) है जो कि 2020 तक लगभग 12% की दर से बढ़ता हुआ 23,800 करोड़ रुपये का हो जायेगा। अगर म्यूजिक, टीवी, फिल्म और अन्य सम्बंधित उद्योगों को एक साथ मिला दिया जाए तो इसका कुल आकार वर्ष 2017 में 22 अरब डॉलर था जो कि 2020 तक बढ़कर 31.1 अरब डॉलर हो जायेगा। ऐसा माना जाता है कि फ़िल्में समाज का दर्पण होतीं हैं अर्थात इन फिल्मों में वही दिखाया जाता है जो कि समाज में घटित होता है. यह बात पूरी तरह से सच मालूम नहीं पड़ती है क्योंकि बहुत सी फ़िल्में केवल कल्पना पर आधारित होतीं हैं और उनमें इतनी अश्लीलता और हिंसा दिखाई जाती है कि भारत में सेंसर बोर्ड को इनके रिलीज होने से मना करना पड़ता है।  

किसी भी फिल्म को सर्टिफिकेट मिलने में लगभग 68 दिन का समय मिल जाता है।  यह प्रावधान सिनेमैटोग्राफ अधिनियम, 1952 की धारा 41 में लिखा गया है। किस फिल्म को कौन सा प्रमाण-पत्र दिया जायेगा इसका निर्णय सेंसर बोर्ड के सदस्यों द्वारा फिल्म को देखने के बाद लिया जाता है। फ़िल्म निर्माण के बाद निर्माता को सेंसर बोर्ड से प्रमाण-पत्र प्राप्त करना अनिवार्य होता है। इसके लिए वह अपने नजदीकी केन्द्रीय फ़िल्म प्रमाणन बोर्ड  के कार्यालय में आवेदन करना पड़ता है। निर्माता अपने आवेदन में स्पष्ट रूप से बताता है कि उसने इस फ़िल्म को किस वर्ग के दर्शकों के लिए बनाया है। सेंसर बोर्ड में सबसे पहले जांच समिति फ़िल्म को देखती है और तय करती है कि उसे U, U/A और A में से किस श्रेणी का प्रमाण पत्र दिया जाए।

यदि समिति के फैसले से निर्माता संतुष्ट है तो फ़िल्म प्रदर्शित कर दी जाएगी लेकिन यदि वह असंतुष्ट है तो वह दूसरी जांच समिति से फ़िल्म को दुबारा देखने की गुजारिश कर सकता है। ऐसे में एक नई समिति फ़िल्म को देखेगी और फैसला देगी। यही समिति बताएगी कि अमुक दृश्य या संवाद को हटाकर फ़िल्म के लिए U या U/A प्रमाण पत्र लिया जा सकता है। इसे ही कैंची चलाना’ कहते हैं। कोई भी निर्माता अपनी फिल्म के लिए U या U/A प्रमाण-पत्र लेना चाहता है क्योंकि इस कारण सभी दर्शक उसकी फ़िल्म को देख सकते हैं। A प्रमाण पत्र मिलने से 18 वर्ष की उम्र से नीचे का एक बड़ा दर्शक वर्ग उसकी फ़िल्म देखने से वंचित रह जाता है और निर्माता को आर्थिक नुकसान होता है। दूसरी बार फ़िल्म को दिखाने के बाद भी यदि निर्माता को उसके मन के अनुसार प्रमाण पत्र नहीं मिलता तो वह Film Certification Appellate Tribunal ( FCAT ) में अपील कर सकता है। यह ट्रिब्यूनल दिल्ली में है जिसमें पूर्व न्यायाधीश शामिल होते हैं। अधिकतर मामलों को FCAT निपटा देता है लेकिन यदि यहां भी फ़िल्म निर्माता की इच्छा पूरी न हुई तो वह उच्चतम न्यायालय का दरवाजा भी खटखटाता है। भारतीय सेंसर बोर्ड के साथ यह दिक्कत है कि वह 1952 में बने कानूनों के आधार पर काम करता है। समय के साथ समाज में बड़े बदलाव आए हैं जिसके कारण लोगों की मानसिक स्थिति में भी व्यापक बदलाव आया है। 

सेंसर बोर्ड के अधिकारों, उसके नियमों को लेकर वर्तमान में लगातार बहसें चल रही हैं। हाल ही में जब सेंसर बोर्ड ने विश्व प्रसिद्ध जेम्स बांड श्रृंखला की फिल्मों के भारत में प्रदर्शन से पहले उसके कुछ दृश्यों पर आपत्ति जताई तो नए सिरे से बहस की शुरुआत हुई। ट्विटर पर हैशटैग के साथ संस्कारी बोर्ड कई दिनों तक लगातार ट्रेंड करता रहा। जेम्स बांड की फ़िल्म के कुछ दृश्यों पर आपत्ति जताने के कारण भारतीय सेंसर बोर्ड की पूरी दुनिया में आलोचना हुई। सेंसर बोर्ड को सिनेमेटोग्राफी एक्ट की धारा 5 बी (1) के तहत फ़िल्म के दृश्यों में काट-छांट का अधिकार मिलता है। इसके अनुसार किसी भी फ़िल्म को प्रदर्शित करने का प्रमाण पत्र तभी दिया जा सकता है  जबकि उससे भारत की सुरक्षा, संप्रभुता और अखंडता पर कोई आंच न आए। मित्र राष्ट्रों के बारे में आपत्तिजनक टिप्पणी न हो। इसके अलावा तीन अन्य शब्द भी हैं- पब्लिक ऑर्डर, शालीनता और नैतिकता का पालन होना चाहिए। इसमें सार्वजनिक शांति या कानून व्यवस्था तक तो बात ठीक है लेकिन शालीनता और नैतिकता की व्याख्या अलग-अलग व्यक्ति अलग-अलग तरह से करते हैं।

सेंसर बोर्ड का यह प्रयास रहता है कि वह फिल्‍मों में अश्लील कॉमेडी, अश्लील सॉन्‍ग, अश्लील सीन्‍स, डबल मीनिंग डायलाग, गाली इत्यादि को ना जाने दे।  बोर्ड, यह भी ध्‍यान देता है कि फिल्‍म के जरिये किसी विशेष धर्म, समुदाय, वर्ग, आस्‍था आदि पर चोट न की जाए ताकि समाज की शांति भंग न हो और देश में अराजकता का माहौल पैदा ना हो। हालांकि समय के साथ सेंसर बोर्ड में कई बदलाव भी आए हैं। 1949 में प्रदर्शित राज कपूर की फिल्म बरसात की नायिकाओं नरगिस और निम्मी ने दुपट्टा नहीं ओढ़ा था इसलिए इस फिल्म को ‘ए’ प्रमाण पत्र दिया गया था लेकिन आज ऐसे दृश्य आम हैं और उन्हें इसके लिए ‘ए’ प्रमाण पत्र नहीं दिया जाता। सरकारें समय-समय पर चलचित्र अधिनियम में बदलाव भी करती रही है। चलचित्र अधिनियम और नियमों की समीक्षा करने और सिफारिशें देने के लिये वर्ष 2013 में मुदगल समिति तथा वर्ष 2016 में श्याम बेनेगल समिति का गठन भी किया गया था।

मुदगल समिति-

इस समिति का गठन 4 फरवरी, 2013 को चलचित्र अधिनियम, 1952 के तहत प्रमाणीकरण मुद्दों पर विचार करने हेतु पंजाब व हरियाणा उच्च न्यायालय के पूर्व मुख्य न्यायाधीश मुकुल मुदगल की अध्यक्षता में किया गया था। मुदगल समिति ने अपनी रिपोर्ट में अश्लीलता और सांप्रदायिक वैमनस्य, महिलाओं के चित्रण और सलाहकार मंडल जैसे मुद्दों के संबंध में दिशा-निर्देश, वर्गीकरण, फिल्मों की पायरेसी, अपीलीय पंचाट की न्याय सीमा तथा चलचित्र अधिनियम, 1952 के प्रावधानों की समीक्षा पर अपनी सिफारिशें प्रस्तुत की थीं।

श्याम बेनेगल समिति-

1 जनवरी, 2016 को फिल्मों के प्रमाणन हेतु सर्वांगीण रूपरेखा का निर्माण करने के लिये श्याम बेनेगल की अध्यक्षता में इस समिति का गठन किया गया था।इस समिति को फिल्म प्रमाणन के लिये विश्व भर में सर्वश्रेष्ठ पद्धतियों पर ध्यान केंद्रित करते हुए और कलात्मक रचनात्मकता को पर्याप्त स्थान प्रदान करते हुए केंद्रीय फिल्म प्रमाणन बोर्ड के लाभ के लिये प्रक्रियाओं और दिशा-निर्देशों के साथ-साथ जन अनुकूल और निष्पक्ष प्रभावी ढाँचे के निर्माण की सिफारिशें प्रस्तुत करनी थीं।

प्रधानमंत्री की अध्यक्षता में केंद्रीय मंत्रिमंडल ने चलचित्र अधिनियम, 1952 (Cinematograph Act, 1952) में संशोधन के लिये चलचित्र संशोधन विधेयक, 2019 को प्रस्‍तुत करने की मंज़ूरी दी है। इस संशोधन का प्रस्ताव सूचना एवं प्रसारण मंत्रालय द्वारा किया गया था। प्रस्तावित विधेयक का उद्देश्‍य फिल्‍म की साहित्यिक चोरी/पायरेसी (Piracy) को रोकना है और इसमें गैर-अधिकृत कैमकॉर्डिंग और फिल्‍मों की कॉपी बनाने के खिलाफ दंडात्‍मक प्रावधानों को शामिल करना है। चलचित्र अधिनियम, 1952 की धारा 6A के बाद एक और धारा 6AA जोड़ी जाएगी। इस धारा के अनुसार, ‘अन्‍य कोई लागू कानून के बावजूद किसी व्‍यक्ति को लेखक की लिखित अनुमति के बिना किसी ऑडियो विजुअल रिकॉर्ड उपकरण का उपयोग करके किसी फिल्‍म या उसके किसी हिस्‍से को प्रसारित करने या प्रसारित करने का प्रयास करने या प्रसारित करने में सहायता पहुँचाने की अनुमति नहीं होगी।” धारा-7 में संशोधन का उद्देश्‍य धारा-6AA के प्रावधानों के उल्‍लंघन के मामले में दंडात्‍मक प्रावधानों को शामिल करना है। मुख्‍य अधिनियम की धारा-7 में उपधारा-1 के बाद उपधारा-1A जोड़ी जाएगी। इसके अनुसार, “यदि कोई व्‍यक्ति धारा-6AA के प्रावधानों का उल्‍लंघन करता है, तो उसे 3 साल तक का कारावास या 10 लाख रुपए तक का जुर्माना या दोनों सज़ा दी जा सकती है।”

प्रस्‍तावित संशोधनों से इस उद्योग के राजस्‍व में वृद्धि होगी, रोज़गार का सृजन होगा, भारत के राष्‍ट्रीय बौद्धिक संपदा अधिकार नीति (India’s National IP policy) के प्रमुख उद्देश्‍यों की पूर्ति होगी और पायरेसी तथा ऑनलाइन विषय-वस्‍तु के कॉपीराइट उल्‍लंघन के मामले में राहत मिलेगी। समय के साथ एक माध्‍यम के रूप में सिनेमा, इसकी प्रौद्योगिकी, उपकरण और यहाँ तक कि दर्शकों में भी महत्त्वपूर्ण बदलाव आया है। पूरे देश में टीवी चैनलों और केबल नेटवर्क के विस्‍तार से मीडिया और मनोरंजन के क्षेत्र में कई परिवर्तन हुए हैं। लेकिन नई डिजिटल तकनीक के आगमन विशेष रूप से इंटरनेट पर पायरेटेड फिल्‍मों के प्रदर्शन से पायरेसी का खतरा बढ़ा है। इससे फिल्‍म उद्योग और सरकार को राजस्‍व की अत्‍यधिक हानि होती है।फिल्‍म उद्योग की लंबे समय से मांग रही है कि सरकार कैमकोर्डिंग और पायरेसी रोकने के लिये कानून में संशोधन पर विचार करे। भारतीय प्रधानमंत्री द्वारा भारतीय सिनेमा का राष्ट्रीय संग्रहालय के उद्घाटन अवसर पर यह घोषणा की गई थी कि कैमकोर्डिंग और पायरेसी निषेध की व्‍यवस्‍था की जाएगी।

जुलाई 2021 में केन्द्र सरकार ने ‘सिनेमेटोग्राफ एक्ट 1952’ में कुछ संशोधन का प्रस्ताव रखा है। इन प्रस्तावों के संबंध में फ़िल्म जगत से जुड़े लोगों का कहना है कि यह अभिव्यक्ति की आज़ादी को नियंत्रित करने की पहल है। इससे सेंसर बोर्ड बेमानी हो जाएगा। सरकार जब चाहेगी किसी भी फ़िल्म का प्रदर्शन रोक सकेगी।

अब तक ए, यू और यू /ए श्रेणियों में फिल्में प्रमाणित की जाती थीं। अब सरकार ने एक प्रस्ताव के तहत यू श्रेणी में उम्र को आधार बनाकर तीन उप श्रेणियां ( 7, 13 और 16 साल से अधिक उम्र के दर्शकों के लिए दिखाई जाने वाली फिल्में ) और जोड़ी हैं। फिल्म जगत की मांग को देखते हुए सरकार ने सिनेमेटोग्राफ एक्ट 1952 में प्रस्तावित संशोधन में फ़िल्म पाइरेसी पर नियंत्रण पाने के उद्देश्य से एक एक नया अनुच्छेद जोड़ा है। इसके तहत सरकार ने शशि थरूर की अध्यक्षता में बनी स्थायी समिति की अनुशंसा को स्वीकार करते हुए पाइरेसी की सजा तीन महीने से तीन साल तक करने के साथ ही जुर्माने की राशि भी बढ़ाकर कुल उत्पादन की पांच फीसदी कर दी है। मगर जिस संशोधन को लेकर फ़िल्म जगत परेशान है उसके मुताबिक केन्द्र सरकार सेंसर बोर्ड को किसी प्रमाणित की जा चुकी फ़िल्म के प्रमाणन पर पुनर्विचार का निर्देश दे सकेगी। सेंसर बोर्ड को अगर लगता है कि कोई फ़िल्म देश की एकता, अखण्डता, सुरक्षा, सार्वजनिक व्यवस्था, शालीनता, न्याय व्यवस्था की अवमानना करती है और दिशा-निर्देशों के अनुरूप नहीं है तो उसे अनुच्छेद 5 बी (1) के तहत प्रमाण पत्र देने से इनकार कर सकता है। इस संशोधन के जरिए किसी शिकायत पर सरकार जब चाहे किसी भी फ़िल्म का प्रदर्शन रोक कर उसे वापस बुला सकती है। एक तरह से जरूरत होने पर किसी फिल्म के प्रमाण पत्र पर अंतिम फैसला सरकार का होगा भले ही उसे सेंसर बोर्ड से प्रमाण पत्र ही क्यों न मिल गया हो।

लेखक- डॉ अरुण कुमार, असिस्टेंट प्रोफेसर, लक्ष्मीबाई महाविद्यालय, दिल्ली विश्वविद्यालय व सम्पादक, लोकमंच पत्रिका, संपर्क – 8178055172, 9999445502, arunlbc26@gmail.com

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